नई दिल्ली [संजय मिश्र]। वामदलों का 'स्पीड ब्रेकर' हटने के बाद वित्तमंत्री पी. चिदंबरम भले ही आर्थिक सुधारों के अधूरे एजेंडे को धुआंधार रफ्तार में आगे बढ़ाने की बात कहें, मगर मौजूदा राजनीतिक हकीकत में ऐसा करना आसान नहीं है। संप्रग के रणनीतिकारों की मानें तो बड़ी मशक्कत से बहुमत साबित करने के बाद अहम वित्तीय महत्व के विधेयकों पर लोकसभा में सरकार शायद ही जोखिम उठाएगी।
इसकी वजह साफ है कि वित्तीय महत्व का विधेयक यदि सरकार लोकसभा में लाती है और यह गिर जाता है तो फिर यह सरकार की हार मानी जाएगी। परमाणु करार को पूरा करने और अपने हिसाब से अगले चुनाव का समय तय करने के लिए इतनी मशक्कत से सरकार बचाने के बाद कांग्रेस व उसके सहयोगी इतना बड़ा खतरा शायद ही मोल लें। सरकार बचाने के आपरेशन में शामिल कांग्रेस के एक वरिष्ठ रणनीतिकार ने भी अनौपचारिक बातचीत में माना कि मानसून सत्र में जहां तक संभव होगा सरकार विवादास्पद विधेयकों को आगे बढ़ाने से बचेगी। संप्रग की पूरी कोशिश होगी कि फिलहाल अपरिहार्य वित्तीय प्रस्तावों और लंबित विधेयकों को पारित करा लिया जाए। विपक्ष और वामदलों को अभी ऐसा कोई मौका न दिया जाए जिससे लोकसभा में एक बार फिर मत विभाजन की नौबत आए।
वित्तमंत्री सहित कांग्रेस के एक खेमे की राय है कि समाजवादी पार्टी के पुख्ता समर्थन और राजग के 'पाला बदलू' सांसदों के संप्रग के साथ खड़े होने के बाद वामदलों को सबक सिखाना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि उन आर्थिक सुधारों मसलन बीमा, पेंशन, रिटेल क्षेत्र में विदेशी निवेश और बैंकिंग सुधार को लागू करने की ओर सरकार बढ़े। मगर चूंकि पेंशन और बीमा सरीखे विधेयक वित्तीय महत्व से जुड़े हैं इसलिए सरकार की राह आसान नहीं है। कांग्रेस प्रबंधक भी मानते हैं कि छोटी-छोटी पार्टियों व निर्दलीय को हर मौके पर लोकसभा में बटोरना बेहद कठिन है। वह भी तब जब विश्वास मत में हारने के बाद विपक्षी खेमा खासतौर से वामपंथी दल व बसपा प्रमुख मायावती सरकार को जवाबी मात देने की ताक में हों।
हालांकि इस वास्तविकता के बावजूद कांग्रेस ने आधिकारिक तौर पर सुधारों को आगे बढ़ाने की चिदंबरम की बात का समर्थन किया। पार्टी के मीडिया विभाग के अध्यक्ष वीरप्पा मोइली ने इस बारे में पूछने पर वामदलों को चिढ़ाने के अंदाज में कहा कि निश्चित रूप से सरकार आर्थिक सुधारों की रुकी बस को बेरोक-टोक पूरे स्पीड से दौड़ाएगी।