बदल रहे हैं खुदरा निवेशक के मानक

 
Nov 01, 06:55 pm

नई दिल्ली [नितिन प्रधान]। निवेशक की पसंद और उसकी समझ के मानक बदल रहे हैं। अब निवेशक भेड़चाल पर यकीन नहीं करता और न ही वह ब्रोकरों, एजेंटों के भरोसे है। वह अब खुद फैसले लेता है और जो उसके मानकों पर खरा उतरता है, उसी के साथ जाता है।

यह हम नहीं कह रहे हैं, पिछले एक डेढ़ साल से शेयर बाजार या प्राथमिक पूंजी बाजार में लिए गए निवेशकों के फैसले इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं। निवेशक अब कंपनी का आईपीओ देखकर अभिभूत नहीं होता। ना ही वह किसी कंपनी में बोनस की घोषणा के अगले दिन उसके शेयर खरीदने की अंधी होड़ में फंसता है। वह जानता है कि उसे कहां पैसा लगाना है।

हम बात कर रहे हैं खुदरा निवेशक यानी हमारे आपके जैसे आम निवेशक की। वह निवेशक जो अपनी कमाई में से बीस-पचास हजार रुपये शेयर बाजार में निवेश करता है और उससे अच्छे रिटर्न की उम्मीद करता है। उसकी पसंद और निवेश के उसके मानकों में आए बदलाव को पिछले 6 महीने के शेयर बाजार के पैटर्न और प्राथमिक पूंजी बाजार में उतरे हालिया 10 पब्लिक इश्यू में निवेश के पैटर्न को देखकर समझा जा सकता है।

नए खिलाड़ियों का खराब प्रदर्शन

पिछले एक डेढ़ साल में प्राथमिक यानी आईपीओ बाजार से पैसा इकट्ठा करने उतरे पब्लिक इश्यू पर नजर डालें तो पाएंगे कि अब आईपीओ के जरिए खुदरा निवेशकों की रुचि शेयर खरीदने में खत्म हो रही है। इसकी एक वजह है शेयर बाजार में उतरी कंपनियों का लिस्टिंग के बाद प्रदर्शन। वैसे तो अब एक के बाद एक आईपीओ शेयर बाजार में लिस्ट होने के बाद मूल कीमत से भी नीचे कारोबार कर रहे हैं। लेकिन सबसे ताजा उदाहरण है इंडिया बुल्स पावर का। यह कंपनी तो शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने के दिन अपनी मूल कीमत को भी बचाए नहीं रख पाई। कंपनी ने 45 रुपये के भाव पर निवेशकों को शेयर दिए और पहले ही दिन स्टाक एक्सचेंज में उसके शेयर 15 प्रतिशत लुढ़क गए।

तकरीबन यही हाल पिछले एक डेढ़ साल में आए सभी पब्लिक इश्यू का रहा है। रिलायंस पावर से जो सिलसिला शुरू हुआ वह एनएचपीसी और इंडियाबुल्स पावर तक बना हुआ है। एक अहम बात इसमें यह भी है कि इस दौरान बुनियादी ढांचे से जुड़ी जितनी भी कंपनियों के पब्लिक इश्यू आए लिस्टिंग के बाद सब एक ही रास्ते पर चले।

कम खुदरा भागीदारी

इसे शेयर बाजार में कंपनियों के लचर प्रदर्शन का नतीजा कहें या इन कंपनियों के पब्लिक इश्यू में खुदरा निवेशकों की कम भागीदारी का नतीजा। लेकिन यह सच है कि खुदरा निवेशकों की भागीदारी नए सार्वजनिक निर्गमों में कम हो रही है। हाल के दस आईपीओ या एफपीओ [किसी सूचीबद्ध कंपनी का फिर से शेयर बाजार में उतरना] में खुदरा निवेशकों की औसत भागीदारी इश्यू के ढाई से तीन गुना रही। जबकि इससे पहले यह भागीदारी 14 गुना तक रहती थी।

यही वजह है कि आजकल पब्लिक इश्यू लाने वाली कंपनियों को अपने इश्यू भरवाने के खास इंतजाम करने पड़ रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण है केबल टीवी नेटवर्क चलाने वाली कंपनी डेन डिजिटल एंटरटेनमेंट नेटवर्क का आईपीओ। बाजार के जानकार बताते हैं प्रोमोटरों को बीते हफ्ते खुले इस आईपीओ को भरवाने के खास इंतजाम करने पड़े। खुदरा निवेशकों ने ही नहीं बड़े निवेशकों ने भी इस इश्यू पर ध्यान नहीं दिया।

निवेशकों का नया रूप

इन दो बातों से ही साफ हो जाता है कि निवेशक का मानस अब बदल गया है। अब वह ज्यादा समझदार है, उसे कंपनी के अच्छे भविष्य का सब्जबाग दिखाकर बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता। उसके पास सूचना पाने के ढेर सारे साधन हैं। अब वह आईपीओ में पैसा लगाने की होड़ से बचने की बजाय लिस्टिंग के दिन कंपनी का प्रदर्शन देखकर निवेश करने का फैसला लेता है। उसे गुरेज इस बात का नहीं है कि शेयर दो रुपये महंगा मिलेगा। दरअसल वह आईपीओ में पैसा लगाकर फंसने का जोखिम नहीं लेना चाहता।

रेगुलेटर की जिम्मेदारी

आखिर ऐसी स्थिति क्यों आ रही है? पब्लिक इश्यू क्यों बड़े मर्चेट बैंकरों से आखिरी समय पर भरवाने की कवायद की जाती है। चूंकि ऐसे सभी बड़े निवेशक कंपनी में सिर्फ लिस्टिंग तक ही टिकते हैं। ये निवेशक तो थोड़ा बहुत मुनाफा कमा कर कंपनी से अलग हो जाते हैं। बाद में शेयर बाजार में कंपनी के शेयर डूबते- उतराते रहते हैं। वैसे शेयर बाजार के रेगुलेटर भारतीय प्रतिभूति व विनिमय बोर्ड [सेबी] के नियमों के मुताबिक आईपीओ में आने वाले निवेश में हर एक लाख रुपये के निवेश पर पांच प्रतिशत यानी बीस हजार रुपये के आवेदन आम या खुदरा निवेशकों के होने चाहिए। लेकिन अगर हाल के पब्लिक इश्युओं पर नजर डालें तो इस अनुपात पर कंपनियां कभी खरी नहीं उतरतीं।

तो क्या सेबी अपना काम ठीक से नहीं कर रही। पहले भी सेबी पर आईपीओ में हो रही प्राइसिंग को लेकर सवाल उठते रहे हैं। क्या सेबी की जिम्मेदारी नहीं है कि वह इस बात पर नजर रखे कि खुदरा निवेशकों की वास्तविक भागीदारी कितनी हो रही है? क्या उसे पब्लिक इश्यू के बाद कंपनियों के इश्यू का आडिट नहीं करना चाहिए? अगर ऐसा नहीं हुआ तो हो सकता है कि खुदरा निवेशकों का कालम ही पब्लिक इश्यू के आवेदन से बाहर हो जाए।




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