
नई दिल्ली [अभिषेक राजा]। मंदी की मार से आटो उद्योग लगभग पूरी तरह से उबर चुका है। पिछले कुछ महीनों में कारों की बिक्री में उम्मीद के मुताबिक हुई वृद्धि से आटो कंपोनेंट बनाने वाली कंपनियों के चेहरे फिर से खिल उठे हैं। बढ़ती मांग को देखते हुए देश की दूसरी सबसे बड़ी टायर कंपनी जेके टायर अपनी विस्तार योजनाओं को अंजाम देने में जुट गई है। जेके टायर एंड इंडस्ट्रीज के वाइस चेयरमैन व एमडी रघुपति सिंहानिया को उम्मीद है कि अगले पांच साल में घरेलू बाजार में रेडियल टायरों की मांग 25 फीसदी बढ़ेगी।
'दैनिक जागरण' से बातचीत में सिंहानिया ने कहा कि कंपनी मंदी से उबर चुकी है। इसका पता चालू वित्त वर्ष 2009-10 की दूसरी तिमाही में कंपनी को हुए मुनाफे से ही चलता है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा, 'हम संभले जरूर हैं, मगर आगे संभल कर चलना ज्यादा जरूरी है।' कारों की बिक्री बढ़ने से टायरों की मांग भी बढ़ी है। इसलिए कंपनी अब अपनी विस्तार योजनाओं को अमलीजामा पहनाने का काम कर रही है। इसी के तहत कंपनी पैसेंजर कारों के रेडियल टायरों का एक नया प्लांट लगाने की दिशा में तेजी से काम कर रही है।
ट्रक और बसों के रेडियल टायरों के 80 फीसदी बाजार पर कंपनी का कब्जा है। शुक्रवार को ही कंपनी के बोर्ड ने 850 करोड़ रुपये की निवेश योजना को मंजूरी दी है। सिंहानिया का कहना है कि कंपनी अब नई भर्तियों पर भी ध्यान केंद्रित कर रही है। हालांकि उन्होंने इसकी संख्या और समय सीमा नहीं बताई। उन्होंने कहा कि अगले साल निर्यात बढ़ाने पर भी कंपनी का विशेष जोर रहेगा। फिलहाल कंपनी अपने उत्पादन का 18 फीसदी ही निर्यात करती है। मेक्सिको स्थित कंपनी की सहयोगी यूनिट टारनेल से ज्यादा निर्यात किया जाएगा। मेक्सिको के बाहर कंपनी की नजर दक्षिण और मध्य अमेरिका के बाजार पर है। इस क्षेत्र में ब्राजील काफी बड़ा बाजार है।
पिछले वित्त वर्ष के दौरान जेके टायर पर भी मंदी का काफी असर रहा। इसी वजह से वित्त वर्ष 2008-09 की दूसरी तिमाही में कंपनी को करीब 32 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा हुआ था। मंदी से निकलने में कंपनी की रणनीति के बारे में सिंहानिया ने कहा कि हमने जहां लागत और खर्चो में कटौती की, वहीं शोध व अनुसंधान पर भी ध्यान दिया। हालांकि कंपनी ने कर्मचारियों की छंटनी के बजाय उनके वेतन में कटौती करना बेहतर समझा।