
नई दिल्ली [मुकेश केजरीवाल]। अब जल्दी ही आयुर्वेदकी पारंपरिक दवाएं भी आप उसी भरोसे के साथ खरीद सकेंगे, जिस तसल्ली से एलोपैथी दवाएं लेते हैं। अप्रैल से अंग्रेजी दवाओं की तरह आयुर्वेद के नियमों से बनी हर दवा पर भी एक्सपायरी डेट [दवा इस्तेमाल करने की सुरक्षित समय सीमा] छपी होगी और उस तारीख से पहले वह दवा दुकान से हटा लेनी जरूरी हो जाएगी।
केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की सचिव [आयुष] एस. जलजा के मुताबिक इसके लिए औषधि और सौंदर्य प्रसाधन कानून, 1940 में संशोधन कर दिया गया है। जलजा कहती हैं कि यह नियम तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है। हर स्तर पर इसे लागू करने के लिए छह महीने की समय सीमा तय की गई है। उसके बाद नियम नहीं मानने वालों पर कार्रवाई होगी। यानी 20 अप्रैल के बाद कोई भी आयुर्वेदिक, यूनानी या सिद्धा दवा उपयोग की अंतिम तिथि का लेबल लगाए बिना नहीं बिक सकेगी।
आयुर्वेद के प्रसिद्ध विशेषज्ञ आचार्य बालकृष्ण कहते हैं कि आयुर्वेदिक दवाएं एलोपैथी से इस मामले में अलग हैं कि ज्यादातर दवाएं एक्सपायरी तारीख के बाद भी उस तरह की प्रतिक्रिया नहीं करतीं जैसी एलोपैथी की। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि इन पर उपयोग की अंतिम तारीख लिखी ही नहीं जानी चाहिए। लेकिन वह जोर दे कर कहते हैं कि आयुर्वेदिक दवा उत्पाद के लिए एक्सपायरी डेट बहुत ही विचारपूर्वक तय की जानी चाहिए। क्योंकि आसव और आरिष्ठ पुराने होने पर ही असर करते हैं। इसी तरह भस्म तो खराब ही नहीं होते। इनकी सलाह को ध्यान में रखते हुए ही सरकार ने आसवों और भस्मों को अंतिम समय सीमा से मुक्त रखा है।
अभी अधिकांश कंपनियां अपने आयुर्वेदिक औषधि उत्पादों पर उपयोग की तारीख या तो छापती नहीं या फिर वो सही अवधि से इतनी ज्यादा होती है कि उसका बहुत मतलब नहीं रह जाता। तब तक इन दवाओं का असर काफी कम हो चुका होता है, लेकिन नियम के अभाव में लोग वही सेवन करने को मजबूर होते हैं।
आयुर्वेदिक दवा बनाने वाली कंपनियों ने भी सरकार के इस कदम का आगे बढ़ कर स्वागत किया है। डाबर कंपनी के प्रवक्ता के मुताबिक यह ग्राहकों को ताकत देने वाला बहुत प्रगतिशील कदम है। दिव्य फार्मेसी ने भी इसे सही कदम बताया है।