
नई दिल्ली [नितिन प्रधान]। बकाया ऋणों को लेकर रिजर्व बैंक का नया निर्देश बैंकों को रास नहीं आ रहा है। अपने कुल बकाया ऋणों के एवज में सत्तर प्रतिशत नकदी का प्रावधान रखने के नियम को बैंक फिलहाल लागू करने के लिए तैयार नहीं हैं। बैंकों ने इसके लिए रिजर्व बैंक से मोहलत देने की गुहार लगाई है।
रिजर्व बैंक ने पिछले महीने की 27 तारीख को ही छमाही मौद्रिक नीति की घोषणा करते हुए बैंकों से उनकी गैर निष्पादित परिसंपत्तियों [एनपीए] के लिए सत्तर प्रतिशत की प्राविजनिंग का निर्देश दिया है। यानी बैंकों को कुल बकाया एनपीए के सत्तर प्रतिशत के बराबर नकद राशि अपने पास सुरक्षित रखनी होगी। बैंकों से इस स्तर को सितंबर 2010 से पहले प्राप्त कर लेने को कहा गया है।
लेकिन बैंक इसे लेकर आनाकानी कर रहे हैं। बैंकों का मानना है कि एक साल की अवधि काफी कम है और इसके लिए उन्हें ज्यादा समय चाहिए। अपनी इस मांग को बैंक रिजर्व बैंक तक पहुंचा भी चुके हैं।
आईडीबीआई बैंक के चेयरमैन व प्रबंध निदेशक योगेश अग्रवाल ने इस बात की पुष्टि करते कहा कि कुछ बैंकों ने रिजर्व बैंक से ज्यादा समय देने को कहा है।
इसके उलट रिजर्व बैंक की चिंता बैंकों के बकाया ऋणों की प्राविजनिंग को लेकर लगातार बढ़ रही है। आरबीआई पहले भी बैंकों से प्राविजनिंग की राशि बढ़ाने को कह चुका है। रिजर्व बैंक की बड़ी चिंता इस बात को लेकर भी है कि प्राविजनिंग नियम के पालन में बैंकिंग क्षेत्र में एकरूपता नहीं है। वर्तमान में बैंक मनमाने तरीके से बकाया ऋणों के लिए प्राविजनिंग कर रहे हैं। बैंक दस से सौ प्रतिशत तक प्राविजनिंग कर रहे हैं। कुछ बैंक तो बकाया ऋणों के लिए दस प्रतिशत से भी कम प्राविजनिंग कर रहे हैं।
इस वक्त देश के बैंकों का कुल एनपीए 61 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का है। इसमें विदेशी बैंकों के बकाया एनपीए शामिल नहीं हैं। रिजर्व बैंक के मुताबिक 31 मार्च 2009 को समाप्त हुए वित्त वर्ष में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का एनपीए 44 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा है। बैंकों के कुल एनपीए में निजी बैंकों की हिस्सेदारी करीब 17 हजार करोड़ रुपये की है।
रिजर्व बैंक चाहता है कि बकाया ऋणों के इस पहाड़ को देखते हुए सभी बैंक अपने पास पर्याप्त मात्रा में नकदी सुरक्षित रखें ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति में बैंकों को वित्तीय संकट का सामना न करना पड़े। लेकिन बैंक ऐसा नहीं कर रहे हैं। चूंकि अर्थव्यवस्था भी ऐसे दौर से गुजर रही है जहां बैंकों के कर्ज पोर्टफोलियो में जोखिम का स्तर बढ़ता जा रहा है। ऐसे में बैंकों को कड़े मानकों के जरिए वित्तीय अनुशासन बनाये रखने की जरूरत है।
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क्या है प्राविजनिंग :
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बैंक से लिये गये ऋण की अदायगी जब रुक जाती है तो एक निश्चित अवधि के बाद ऋण की उस राशि को बंट्टे खाते में डाल दिया जाता है। बैंकिंग की भाषा में ऐसे ऋणों को गैर निष्पादक परिसंपत्तियां [एनपीए] कहा जाता है।
इस एनपीए के लिए बैंकों को अपनी बैलेंसशीट में नकद राशि का प्रावधान करना होता है ताकि जोखिम से बचा जा सके। एनपीए में लगातार उतार-चढ़ाव होता रहता है। इसलिए बैंकों को इसके लिए पर्याप्त राशि का प्रावधान अपनी बैलेंसशीट में करना होता है।