पिछली आतंकी घटनाओं की तरह जयपुर में बम विस्फोटों के बाद भी लकीर पीटने का काम एक घिसी-पिटी परंपरा के रूप में हो रहा है। आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाले वरिष्ठ-कनिष्ठ लोग चाहे जैसा दावा क्यों न करें, देश की जनता इस नतीजे पर पहुंचने के लिए विवश है कि उनमें आतंकवाद का मुकाबला करने की इच्छाशक्ति शेष नहीं रह गई है। जयपुर में बम विस्फोटों के बाद जिस तरह गुमनाम से आतंकी गुटों का नाम उछला है और पाकिस्तान, बांग्लादेश के साथ-साथ नेपाल तथा म्यांमार को भी शक की निगाह देखा जा रहा है उससे यदि कुछ प्रमाणित हो रहा है तो यह कि भारत की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। जयपुर में एक साथ कहीं अधिक और ज्यादा घातक साबित होने वाले बम विस्फोट इसकी पुष्टि कर रहे हैं कि आतंकी संगठन जब चाहें तब दहशत फैलाने में सक्षम हो गए हैं। इससे राष्ट्र की बदनामी होने लगी है और साथ ही आम जनता के मनोबल पर बुरा असर भी पड़ने लगा है। खुद को झूठी दिलासा देने के लिए इस पर संतोष व्यक्त किया जा सकता है कि आतंकी आम जनता के बीच वैमनस्य पैदा करने में सफल नहीं हुए और दहशतजदा लोगों का जीवन फिर से पटरी पर लौट पर आया, लेकिन यथार्थ यह है कि आतंकी संगठन देश पर भारी पड़ रहे हैं। केंद्र एवं राज्य सरकारें सुरक्षा व्यवस्था तो बढ़ाती चली जा रही हैं, लेकिन ऐसा कुछ नहीं कर पा रही हैं जिससे आतंकियों को अपनी जान बचाना मुश्किल हो जाए। क्या किसी ने इस पर विचार किया है कि आखिर कितने शहरों में कितने स्थानों पर सुरक्षा व्यवस्था सघन की जाती रहेगी? शासन तंत्र का मौजूदा रवैया तो चप्पे-चप्पे पर पुलिसकर्मी तैनात करने वाला है। यह संभव नहीं और हो भी नहीं सकता। आतंकवाद का खात्मा करने के लिए आतंकियों में भय का संचार करना होगा और यह तब होगा जब उन पर चारों ओर से वज्र प्रहार किया जाएगा।
जयपुर की घटना के बाद केंद्रीय जांच एजेंसी के गठन का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आना शुभ संकेत अवश्य है, लेकिन यदि इस मसले पर सिर्फ विचार-विमर्श ही होता है तो इससे निराशाजनक और कुछ नहीं हो सकता। गंभीर अपराधों और विशेष रूप से आतंकवाद पर लगाम लगाने के लिए किसी संघीय जांच एजेंसी के गठन की आवश्यकता राजग शासन के समय जताई गई थी, लेकिन राज्य सरकारों ने उस पर गंभीरता का परिचय नहीं दिया। विडंबना यह है कि वे अभी भी केंद्रीय जांच एजेंसी के गठन पर आनाकानी कर रही हैं। इसका मूल कारण पुलिस का मनमाना इस्तेमाल करने की प्रवृत्तिहै। इसी प्रवृत्तिके चलते राज्य सरकारें पुलिस ढांचे में सुधार से भी इनकार कर रही हैं और वह भी उच्चतम न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद। यह इनकार एक प्रकार से आंतरिक सुरक्षा के समक्ष जानबूझकर खतरे खड़े करने वाला कृत्य है। यदि केंद्रीय सत्ता संघीय जांच एजेंसी के गठन को लेकर वास्तव में गंभीर है तो फिर उसे राज्यों का मुंह ताकने के बजाय उन पर दबाव बनाना होगा। आखिर मामला आंतरिक सुरक्षा का ही नहीं, बल्कि देश के मान-सम्मान का भी है। जयपुर की घटना के बाद आरोप-प्रत्यारोप के सिलसिले का इसलिए कोई अर्थ नहीं, क्योंकि देश में बेलगाम आतंकवाद के लिए जितनी जिम्मेदार केंद्रीय सत्ता है उतनी ही राज्य सरकारें भी हैं।
[मुख्य संपादकीय]