गढ़वाल मंडल विकास निगम, वन विभाग समेत राज्य के कई सरकारी महकमों के दैनिक वेतनभोगी और संविदा कर्मचारियों के लिए नियमित होने का एक अच्छा मौका हाथ आता दिख रहा हैै। बताया जा रहा है कि वन विभाग में करीब 11 सौ तथा गढ़वाल मंडल विकास निगम में इस श्रेणी में आने वाले कर्मियों की संख्या तकरीबन चार सौ के आसपास है। इन दो विभागों में इन कर्मियों को नियमित करने का निर्णय हो चुका है। चूंकि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार सभी विभागों में 1996 से पहले नियुक्त किए गए दैनिक वेतन भोगी तथा संविदा कर्मियों को नियमित करने तथा अपात्रों को सेवा से मुक्त करने के निर्देश के तहत सरकार ने एक मंत्रिमंडल की एक उप समिति का गठन किया है। इसे रास्ता तलाशना है कि कैसे न्यायालय के आदेश का पालन भी हो और कर्मियों का भी भला हो जाए। इसकी संस्तुतियों के आधार पर ही वन विभाग व निगम ने आदेश जारी भी कर दिए हैं। अब जल्द ही दूसरे सरकारी विभागों में भी इस तरह के निर्णय होने की संभावना जताई जा रही है। इस तरह सभी सरकारी विभागों में हजारों कर्मचारी अपने वे अधिकार प्राप्त कर सकेंगे, जिनसे उन्हें ढीली सरकारी कार्य प्रणाली के कारण पिछले कई सालों से वंचित रहना पड़ रहा था। अब सरकार के सामने समस्या उन कर्मचारियों की आ रही है, जो कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय आते वक्त यानि 2006 में दस साल का सेवा पूरी नहीं कर सके थे। यदि दस से थोड़ा कम समय होने के कारण उन्हें नियमित होने से वंचित रहना पड़ता है तो उनके भविष्य का क्या होगा, क्योंकि अब वे किसी अन्य विभाग में सेवा के लायक भी नहीं रह गए हैं। कैबिनेट उप समिति इस तरह के सवाल से जूझ रही है। यह भी सच है कि सरकारी विभागों में दैनिक वेतन तथा संविदा में कई बार नेताओं को खुश करने के लिए उनके चहेतों को एडजस्ट किया जाता है, जिनकी वास्तव में विभाग को जरूरत नहीं होती। ऐसे लोगों के नियमित होने का लाभ तो विभाग को नहीं मिलेगा पर जिन विभागों में वास्तव में कर्मचारियों की कमी है या सालों से संविदा या दैनिक वेतनभोगी के रूप में काम कर जिन लोगों ने विभाग को अपना सर्वस्व समर्पित किया है, उनके लिए यह एक अच्छा मौका होगा।
[स्थानीय संपादकीय: उत्तराखंड]