सरकार की उदासीनता

 
May 16, 10:49 pm

बच्चों की परवरिश के प्रति लापरवाही को लेकर अदालत की सक्रियता निश्चित तौर पर काबिलेतारीफ है। दरअसल, जेल में बंद अपराधियों के बच्चों के लिए केंद्र सरकार की ओर से सहायता योजना चलाए जाने के बावजूद ऐसे कई बच्चे हैं, जो अब तक इसके लाभ से वंचित रहे हैं। गौरतलब है कि जेल में बंद माता-पिता के बच्चों के कल्याण के लिए वर्ष 2004 में केंद्र सरकार ने एक योजना चलाई थी। लेकिन अदालत में पेश एक मामले में जब यह पता चला कि एक अभियुक्त पिता के तीन बच्चों के भरण-पोषण के लिए अब तक सरकार ने कोई सहायता नहीं दी है, तो अदालत ने इस पर केंद्र व राज्य सरकार को जवाब देने को कहा है। बहरहाल, ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार द्वारा चलाई जा रही ज्यादातर योजनाओं की तरह यह योजना भी उदासीनता की भेंट चढ़ गई है। हालांकि सरकार ने यह जानकारी दी है कि वह ऐसे बच्चों की भलाई पर अब तक कितने रुपये खर्च कर चुकी है, पर यह स्पष्ट नहीं किया है कि एक बच्चे पर कितना खर्च हुआ है।

यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि चाहे शिक्षा व रोजगार का मामला हो या फिर आर्थिक मदद व परवरिश का, सरकार बच्चों के प्रति गंभीर नहीं दिखती। यह एक जमीनी हकीकत है कि ज्यादातर वैसे बच्चे, जिनके माता-पिता किसी मामले में सजा काट रहे हों, अभावों की जिंदगी जीने को मजबूर होते हैं। ऐसे बच्चों को विवशता में बाल श्रम का सहारा लेना पड़ता है। कानूनी प्रावधान यह है कि चौदह वर्ष से कम उम्र के बच्चों से न तो कारखानों में काम लिया जा सकता है और न ही उन्हें होटलों व घरों में नौकरों की तरह रखा जा सकता है। लेकिन आश्चर्य की बात है कि सरकार की नाक के नीचे राजधानी में ऐसे कई बच्चे हैं, जो बाल श्रमिक के रूप में काम करने को मजबूर हैं। अलबत्ता, समय-समय पर श्रम निरीक्षकों की ओर से छापेमारी की कार्रवाई होती है और ऐसे बच्चे मुक्त भी करवाए जाते हैं। लेकिन उन बच्चों का क्या होता है? उनकी शिक्षा-दीक्षा के लिए क्या व्यवस्था की जाती है, इस संबंध में बहुत कुछ जानकारी नहीं मिल पाती। जाहिर है, ऐसे बच्चे आर्थिक बदहाली के कारण फिर से उसी दलदल में धंसने को मजबूर होते हैं, जहां से उन्हें निकाला जाता है। आखिर हमारे देश में सरकारें बच्चों के प्रति कब संवेदनशील होंगी, ताकि उनका भविष्य संवर सके?

[स्थानीय संपादकीय: नई दिल्ली]




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