लाइलाज महंगाई

 
May 16, 10:55 pm

मुद्रास्फीति की दर बढ़कर 7.83 प्रतिशत होना इसकी पुष्टि कर रही है कि महंगाई थामने के सरकारी प्रयास विपरीत परिणाम दे रहे हैं। अब तो यह शंका भी हो रही है कि हमारे नीति-निर्माता यह जानते ही नहीं कि महंगाई पर लगाम कैसे लगाई जा सकती है? चूंकि वक्त गुजरने के साथ मुद्रास्फीति बढ़ती जा रही है इसलिए सरकार का यह दावा भी खोखला नजर आने लगा है कि महंगाई रोकने के लिए उठाए गए कदमों का परिणाम सामने आने में समय लगेगा। आखिर कितना समय और लगेगा? यदि केंद्रीय सत्ता मौजूदा माहौल में महंगाई पर काबू पाने में सक्षम नहीं तो फिर उसे झूठी दिलासा देना बंद करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करके वह खुद की विश्वसनीयता के लिए संकट खड़ा कर रही है। यद्यपि वित्तामंत्री पी चिदंबरम ने जनता को थोड़ा और धैर्य रखने की सलाह दी है, लेकिन इसके आसार कम हैं कि वह महंगाई पर प्रभावी ढंग से अंकुश लगा सकेंगे। उनके दावे पर संदेह का एक कारण तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के बढ़ते मूल्य हैं और दूसरा कारण कुछ घरेलू उद्योगों का गठजोड़ है। यह तो समझ आता है कि कच्चे तेल के मूल्यों पर भारत सरकार का कोई नियंत्रण नहीं, लेकिन आखिर क्या कारण है कि वह उद्योगों के ऐसे गठजोड़ से नहीं निपट पा रही जिसे स्वयं वित्तामंत्री शातिराना बता रहे हैं? यह भी विचित्र है कि सरकार ऐसे उद्योगों से कड़ाई से पेश आने के बजाय उनसे अनुरोध-आग्रह कर रही है जो प्रतिबंधित व्यापार व्यवहार में लिप्त हैं। बड़े उद्योगों के समक्ष सरकार का असहाय दिखना उसकी साख को संकट में डालने वाला है। बढ़ती महंगाई के इस दौर में यह भी ध्यान रहे कि सरकार का फल-सब्जियों की उपलब्धता पर कोई जोर नहीं हो सकता। कुछ ऐसी ही स्थिति खाद्यान्न के संदर्भ में भी है। यदि कभी किसी फसल की उपज अच्छी होती है तो बाजार में उसकी उपलब्धता बढ़ जाती है, अन्यथा किल्लत पैदा हो जाती है। हालात तब बिगड़ जाते हैं जब सरकार समय रहते यह अनुमान नहीं लगा पाती कि आने वाले समय में खाद्यान्न उत्पादन का ग्राफ गिरेगा या बढ़ेगा?

संप्रग सरकार ने एक नहीं अनेक बार यह साबित किया है कि उसे खाद्यान्न विशेष की कमी के बारे में देर से पता चलता है। क्या ऐसा इसलिए है कि वह जमीनी हालात से परिचित नहीं होती या फिर इसकी आवश्यकता ही नहीं समझती? इस पर आश्चर्य नहीं कि महंगाई के बेकाबू होने पर वह राजनीतिक मुद्दे का शक्ल ले लेती है। आश्चर्य इस पर है कि प्रतिपक्ष महंगाई के बहाने राजनीतिक लाभ बटोरने की कोशिश करता है और सत्तापक्ष अपनी गलती किसी और पर थोपने में लग जाता है। इन दिनों ऐसा ही हो रहा है। जहां केंद्र सरकार बेलगाम महंगाई के लिए किस्म-किस्म के कारण गिना रही है वहीं विपक्षी दल उसके खिलाफ धरना-प्रदर्शन और आंदोलन कर रहे हैं। घोर आश्चर्य यह है कि वाम दल महंगाई के विरोध में विपक्ष से भी दो हाथ आगे दिखने की कोशिश कर रहे हैं। क्या ये वही दल नहीं जो संप्रग सरकार की गर्दन पर सवार रहते हैं? यदि पक्ष-विपक्ष के सभी राजनीतिक दलों ने महंगाई के परिणामों को गंभीरता से समझा होता तो आज शायद वे उससे निपटने के लिए मिलकर कोशिश कर रहे होते। दुर्भाग्य से मौजूदा राजनीतिक माहौल में आगे भी ऐसा होने की संभावना नहीं।

[मुख्य संपादकीय]




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