31 मार्च को प्रदेश की राजग सरकार ने पिछली कई सरकारों का कलंक धोते हुए वित्त रहित शिक्षा नीति खत्म करने का एलान किया था। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विधानमंडल में इसकी घोषणा करते हुए सरकारी अनुदान का फार्मूला भी बताया था, जिसके अनुसार शिक्षण संस्थानों को उनके छात्र-छात्राओं की कामयाबी, यानी प्रदर्शन के आधार पर अनुदान मिलना था। इससे पहले विगत 25 वर्षो से बड़ी संख्या में ऐसे स्कूल-कालेज पनपे और चल रहे थे, जिनकी पढ़ाई को तो मान्यता दी गयी थी, लेकिन सरकार उन्हें कोई वित्तीय सहायता देने के लिए राजी नहीं थी। निजी क्षेत्र में डिग्री-इंटर कालेज एवं माध्यमिक विद्यालय खोलने की अनुमति दे दी गई थी, किंतु तत्कालीन सरकार ने मानक निर्धारित नहीं किए थे, जिसके आधार पर इन्हें आर्थिक सहायता दी जा सके। इसके अपने तर्क थे, लेकिन इसका सबसे बुरा असर इन संस्थानों में पढ़ाने वाले वास्तविक शिक्षकों और कर्मचारियों पर पड़ा। वित्त रहित संस्थान होने के चलते इनके वेतन से सरकार का कोई लेना-देना नहीं था। वे संस्थान प्रबंधन की कृपा पर रहे। संस्थान अपने छात्रों की फीस तो समय-समय पर बढ़ाते रहे, लेकिन उसका लाभ शायद ही कभी शिक्षक-कर्मचारी समुदाय को मिलता रहा। लिहाजा, इस वर्ग को अपने करियर के सबसे कीमती दौर मुफलिसी में गुजारने पड़े। यह सचमुच त्रासद रहा। अब इस दिशा में सरकार की पहल से जब उम्मीद की किरण फूटी,तब भी धुंध कायम रही। घोषणा के दूसरे दिन तक मिली-जुली प्रतिक्रिया आती रही। कहीं शिक्षक-कर्मचारी खुशी मनाते दिखे और मिठाइयां भी बंटीं, तो कहीं असंतोष के स्वर उभरे। फिर जल्द ही यह साफ हो गया कि सरकार के फैसले से बेशक अब कोई वाजिब गैर सरकारी स्कूल-कालेज राजकीय वित्तीय सहायता से वंचित नहीं रहेगा, लेकिन इससे शिक्षकों-कर्मचारियों के दिन नहीं फिरने वाले थे। यह समझ जैसे-जैसे बढ़ी, वंचित वर्ग का रोष केंद्रीभूत होने लगा।
दो अप्रैल को हजारों शिक्षकों ने विधानमंडल का घेराव करना चाहा। राजधानी के हार्डिग पार्क से चले प्रदर्शन को पुलिस प्रशासन ने आर.ब्लाक चौराहे पर रोका, तो वे इतने उग्र हो गये कि लोहे का गेट भी उन्हें रोकने में नाकाम रहा। यह उनके संचित आक्रोश की ताकत थी। प्रदर्शनकारियों ने वित्त रहित शिक्षा नीति की समाप्ति के साथ वेतन की गारंटी देने, विद्यालयों एवं महाविद्यालयों के अधिग्रहण करने, संस्कृत, मदरसा एवं प्राथमिक विद्यालय को शामिल करने की मांग की थी। इस पर सरकार ने तत्काल कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करने की अपेक्षा गंभीरता से विचार करना मुनासिब समझा। यह मुख्यमंत्री की संवेदनशीलता ही थी कि उग्र प्रदर्शन के लगभग डेढ़ माह के भीतर ही वित्तरहित शिक्षण संस्थानों के संबंध में फैसला बदला जा रहा है। अब कालेज प्रबंधन को नहीं, बल्कि वित्तरहित शिक्षकों को सीधे राशि दी जाएगी। इतना ही नहीं, पूर्व में घोषित राशि में वृद्धि भी की जाएगी। इसमें मानव संसाधन विकास विभाग के नए मंत्री हरिनारायण सिंह ने भी सराहनीय भूमिका निभायी। त्रुटिपूर्ण फैसलों में सुधार न कर अक्सर सरकारें राजहठ दिखाती रहीं हैं, लेकिन इससे किसी का भला नहीं होता।
[स्थानीय संपादकीय: बिहार]