उत्तराखंड का कुदरती आपदाओं से गहरा रिश्ता है। कभी भूकंप आता है तो कभी जबर्दस्त बर्फबारी, हिमस्खलन, भूस्खलन और उपलवृष्टि से धन-जन हानि होती है। उत्तरकाशी और चमोली के भूकंप में हुई धन-जन हानि को भुलाया नहीं जा सकता। भूकंप ने जो तबाही का मंजर पैदा किया, उसे किसी भी स्थिति में विस्मृत नहीं किया जा सकता। उत्तरकाशी में वरुणावत पर्वत टूटने से जो नुकसान हुआ, वह भी सर्वविदित है। कहने का तात्पर्य यह कि समूचे राज्य में कोई न कोई आपदा आती ही रहती है। भूकंप की दृष्टि से तो समूचा राज्य अति संवेदनशील है ही। आये दिन भूकंप के छोटे-मोटे झटके लगते रहते हैं। इसके मद्देनजर राज्य सरकार फिलहाल सतर्क लगती है। यूं तो राज्य के आठ जिलों में आपदा प्रबंधन की दृष्टि से कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, लेकिन भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील जोन चार के पांच जिलों में सेवन डेस्क कंट्रोल की व्यवस्था की जा रही है। इसे बेहतर माना जाना चाहिए। जब समूचा राज्य भूकंपीय क्षेत्र में आता है तो पहले से पहले ही सारी व्यवस्थाएं कर ली जानी चाहिए। आपदा आने पर आनन-फानन में जो इंतजाम किये जाते हैं, वे जल्दबाजी के होते हैं और उनसे जनता को भरपूर राहत भी नहीं मिलती है। लेकिन अगर व्यवस्थाएं पहले से ही हैं तो किसी भी आपात स्थिति का आसानी से सामना किया जा सकता है। नागरिकों को भी इस बात का अहसास होगा कि राज्य सरकार कितनी सतर्क है। ऐसा नहीं है कि भीषण आपदा की स्थिति में केन्द्र सरकार, अन्य राज्य सरकारें या बाहरी मुल्कों से मदद नहीं आती, लेकिन जब तक यह मदद आती है तब तक काफी नुकसान हो चुका होता है। अन्य सरकारें या दूसरे देशों की मदद तात्कालिक दृष्टि से उतनी कारगर सिद्ध नहीं होती, जितनी राज्य सरकार की। इस बात से स्वयमेव सिद्ध हो जाता है कि सूबे की सरकार को किसी भी आपदा की स्थिति से जूझने के लिए पहले से तैयारी कर लेनी चाहिए। सरकार को इस बात पर भी गौर रखना चाहिए कि वह जो सेवन डेस्क कंट्रोल व्यवस्था कर रही है, उस पर वास्तविक ढंग से अमल हो। उसकी योजना मात्र कागजी बनकर न रह जाए अन्यथा योजना का मकसद ही बेमानी सिद्ध होगा।
[स्थानीय संपादकीय: उत्तराखंड]