भारत ने परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह से छूट प्राप्त करके अंतरराष्ट्रीय फलक पर एक बड़ी कामयाबी हासिल की है। यह हर दृष्टि से हमारी ऐतिहासिक उपलब्धि है। इसका श्रेय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके उन कूटनीतिज्ञों को जाता है जिन्होंने परमाणु करार के पक्ष में दुनिया भर में माहौल बनाया। इस शानदार उपलब्धि से यह साफ तौर पर रेखांकित हो रहा है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का कद सचमुच बढ़ा है और अब उसकी अनदेखी करना आसान नहीं। परमाणु करार संबंधी भारत केंद्रित प्रस्ताव को 45 सदस्यीय एनएसजी की हरी झंडी मिलना इसलिए विशेष रूप से उल्लेखनीय है, क्योंकि इस संगठन का निर्माण ही सिर्फ इसलिए हुआ था ताकि भारत के सैन्य-असैन्य परमाणु कार्यक्रम को हर संभव तरीके से बाधित किया जा सके। यह जानना दिलचस्प होगा कि खुद एनएसजी के दस्तावेज यह कहते हैं कि 1974 में इस संगठन का गठन एक देश द्वारा नाभिकीय परीक्षण करने के कारण किया गया। ज्ञात हो कि इसी वर्ष भारत ने परमाणु परीक्षण किया था। स्पष्ट है कि भारत को परमाणु क्लब से बाहर रखने के लिए एनएसजी का गठन आनन-फानन में किया गया। जिस संगठन ने भारत के खिलाफ गोलबंद होते समय अपने दस्तावेजों में उसका नाम लेना तक उचित नहीं समझा वह यदि 34 वर्ष बाद उसके समक्ष नतमस्तक हुआ तो यह वैश्विक राजनीति में आए एक बड़े बदलाव का सूचक है। न केवल वैश्विक स्तर पर भेदभावपरक एक मजबूत दीवार ढह गई, बल्कि ताकतवर देशों की एक ऐसी लाबी परास्त हो गई जिसने अपने और शेष दुनिया के लिए अलग-अलग नियम बना रखे थे। यदि परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह वास्तव में नाभिकीय अप्रसार के खतरे से निपटना चाहता है तो उसे एनपीटी और सीटीबीटी सरीखी संधियों से पीछा छुड़ाकर परमाणु हथियार विहीन दुनिया की दिशा में सोचना होगा। यह सोच तब कामयाब होगी जब सभी देश परमाणु हथियारों का परित्याग करने के लिए तैयार होंगे। देखना है कि इस दिशा में ईमानदारी से चिंतन-मनन होता है या नहीं?
यह निराशाजनक है कि विश्व के प्रमुख राष्ट्र तो भारत-अमेरिका परमाणु करार पर अपना दृष्टिकोण बदलने के लिए तैयार हो गए, लेकिन हमारे अपने राजनीतिक दल अपनी मिथ्या धारणा और संशय का परित्याग करने के लिए तैयार नहीं। अपेक्षा के अनुरूप भाजपा और वाम दलों को एनएसजी में हासिल सफलता रास नहीं आई। वाम दलों द्वारा परमाणु करार का विरोध तो तब भी समझ आता है, क्योंकि उन्हें अमेरिका के नाम से ही चिढ़ है, लेकिन आखिर भाजपा इस करार का विरोध करने पर क्यों आमादा है? उसकी मानें तो भारत के लिए तात्कालिक रूप से एक और परमाणु परीक्षण करना आवश्यक है, न कि ऊर्जा संकट का समाधान खोजना? क्या वास्तव में ऐसा है? अब जब परमाणु करार के रास्ते की सारी बाधाएं समाप्त हो गई हैं और अमेरिकी संसद से इस करार को मंजूरी मिलना तय सा है तब फिर बेहतर यही है कि विपक्षी राजनीतिक दल उससे भयभीत होने और देश को भ्रमित करने से बचें। चूंकि अमेरिकी संसद से परमाणु करार को स्वीकृति मिलने में देर नहीं इसलिए परमाणु करार को यथार्थ के धरातल पर उतारने की रूपरेखा बनाई जानी चाहिए। वैसे भी आम जनता के लिए परमाणु करार तभी महत्वपूर्ण साबित होगा जब उसे ऊर्जा संकट का समाधान होता दिखाई देगा।
[मुख्य संपादकीय]