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डूबती नावों के दिन फिरे

Sep 07, 12:34 am
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कोसी का पानी घट रहा है, लेकिन पटना में राजनीतिक बयानों की बाढ़ से मीडिया के स्पेस कम पड़ रहे हैं। शुक्रवार को राजधानी में लगभग हर आधे घंटे पर एक प्रेस कांफ्रेंस हुई- इनमें से कुछ तो एक ही समय पर । सबको बाढ़ पर ही बोलना था। विषय एक था। बात भी एक ही कहनी थी। इसे एक-दो वाक्य में कहा जा सकता था,और वह वाक्य इस तरह लिख सकते थे : 'कोसीजन्य आपदा के लिए नीतीश कुमार की सरकार जिम्मेदार है। उन्हें हटा कर हमें सत्ता मिलनी चाहिए।' पता नहीं, इतनी-सी बात सीधे न कह पाने के बचे हुए सार्वजनिक लिहाज के चलते रोज हजारों शब्द हवा में उछाले, सुनाये और छापे जा रहे हैं या ऐसा करना इन शब्दों में दबी-छिपी आकांक्षा को सच में बदलने की रणनीति का हिस्सा है,कहना मुश्किल है। सामान्य अवस्था में राज्य विधानसभा का चुनाव तो कोई 26 माह दूर है, लेकिन जो लोग खुद को सीएम-इन-वेटिंग मानते हैं, उन्हें लगता है कि ये महीने दिनों में बदल जाते तो कितना अच्छा होता! बाढ़ के नाम पर इस सरकार की बलि लेने का कोई उपाय निकल आता, राष्ट्रपति शासन से होते हुए मध्यावधि चुनाव का कोई जुगाड़ लग जाता, तो 25 लाख लोगों के लिए शोक का कारण बनी कोसी कुछ बड़े लोगों के लिए शोकनाशिनी सिद्ध हो सकती थी। राजनीति में असंभव क्या है? लोग पानी में डूबे हैं, मर-मर कर जी रहे हैं या उनके घर-खेत नदी में समा गये हैं, लेकिन इसी में राजग सरकार की प्रलय-पूर्व लोकप्रियता भी तो डूबी है। इस घटना ने माहौल बदल दिया है। जिनकी राजनीतिक कश्ती डूबती नजर आ रही थी, वे फिर से लहरों पर सवार हैं। कागज की नावें सहसा जंगी जहाज में बदलने लगी हैं। उनमें मिसाइलें फिट की जा रही हैं। सरकार के सारे राहत कार्य नाकाफी बताये जा रहे हैं या उन पर अविश्वास किया और जनता में भरा जा रहा है। विपक्ष का हर नेता पीड़ित क्षेत्रों का दौरा करने के बाद प्रशासन को जी भर कोस रहा है। सेना के जवानों की अथक मेहनत के लिए किसी के पास शुक्रिया के शब्द नहीं हैं। जो स्वयंसेवी संगठन या उद्योग जगत के लोग संकट के साथी बन कर आये हैं, उनका जिक्र प्रचारात्मक मान लिया गया है। यह दृश्य का एक पहलू है।

दूसरी तरफ बेशक, हालात भयावह और दारुण हैं। विपदा जितनी बड़ी है, उसके सामने सरकार के तंत्र अपर्याप्त साबित हो रहे हैं। कहीं दवा कम पड़ रही है, तो कहीं डाक्टर नहीं हैं। मामूली बीमारियां जान लेने लगी हैं। कोसी पुत्र कहलाने वाले मंत्री और अफसर पीड़ितों के कोपभाजन बनने लगे हैं। बचाव में अब सरकार की तरफ से कहा जा रहा है कि लालू प्रसाद के शासन में 1991 में भी कोसी का तटबंध टूटा था। टूटने को लेकर जो स्थितियां उस समय थीं, वही आज भी हैं। उस समय भी यहां के इंजीनियरों को नेपाल में बचाव का काम नहीं करने दिया गया। इसके लिए उस समय की विधानसभा में तत्कालीन मंत्री का जवाब कोट किया जा रहा है। क्या इसका भी कोई दस्तावेज है कि 1991 में ऐसी ही तबाही हुई थी? हालत अगर उन्हीं दिनों जैसी है, तो बूढ़े होते कुसहा जैसे तटबंध बिहार में बदलाव की बयार बहाने वालों के एजेंडे से बाहर क्यों पड़े रह गये? इसकी नैतिक जिम्मेवारी लेने वाला कोई सामने नहीं आया। कोसी में क्या यह शब्द भी डूब गया है?

[स्थानीय संपादकीय: बिहार]

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