गलत प्रेरणा

 
Nov 02, 10:43 pm

फिल्मों से प्रेरणा लेकर अपराध करने की प्रवृत्ति में कहीं से भी कमी न आना यही प्रदर्शित करता है कि अपराधियों को परिणाम की जरा भी परवाह नहीं है। 'शूटआउट एट लोखंड वाला' की तर्ज पर माया गिरोह बनाकर राजधानी में लूटपाट की दर्जनों वारदातों को अंजाम देने वाले अपराधियों की गिरफ्तारी से एक बार फिर साबित होता है कि फिल्में किस तरह अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को और अधिक प्रोत्साहित कर रही हैं। हालांकि फिल्मों से प्रेरणा लेकर अपराध करने का यह कोई पहला मामला नहीं है, लेकिन बिना मेहनत किए ऐशो-आराम की जिंदगी जीने की चाहत ऐसे अपराधियों के विवेक पर पर्दा डाल देती है। वे यह भूल जाते हैं कि ऐशो-आराम की यह जिंदगी ज्यादा दिन नहीं चलेगी। एक न एक दिन उनके अपराध का घड़ा जरूर भरेगा और वे पुलिस की गिरफ्त में जरूर आएंगे। ऐसा नहीं है कि फिल्मों में शिखर पर बैठे अपराधियों का हश्र बुरा नहीं होता है, लेकिन व्यावहारिक तौर पर इनसे प्रेरणा लेकर अपराध करने वालों को संभवत: यह हश्र दिखाई नहीं देता। अगर उन्हें इस सच्चाई का अहसास हो जाए कि वे पूरी जिंदगी अपराध की दुनिया में नहीं बने रह सकते और उनके बाद उनका घर-परिवार दाने-दाने को मोहताज हो जाएगा तो वे शायद ही अपराध करने की सोचें।

यहां सबसे निराशाजनक पुलिस की भूमिका भी मानी जानी चाहिए जिसका अपराधियों में कोई भय नहीं दिख रहा। अगर ऐसा नहीं होता तो देश की राजधानी में अपराधी इस तरह संगठित होकर और गिरोह बनाकर अपराध करने का दुस्साहस नहीं कर पाते। दिल्ली पुलिस भले ही माया गिरोह के कई सदस्यों को गिरफ्तार कर अपनी पीठ खुद थपथपा रही हो, लेकिन इतने से ही संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता। दिल्ली में पिछले कुछ महीनों से अपराधों की बाढ़ को देखते हुए पुलिस जहां निष्क्रिय दिख रही है, वहीं अपराधी पूरी तरह सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। दिन-दहाड़े होने वाले अपराधों को देखते हुए लगता ही नहीं कि राजधानी में पुलिस नाम की भी कोई ताकत है, जिसके नाम पर अपराधियों में खौफ हो। प्रश्न यह है कि क्या चंद मुजरिमों को पकड़कर ही राजधानी की कानून-व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त किया जा सकता है? आखिर पुलिस क्यों आत्ममुग्ध है? दिल्ली में हो रहे अपराधों पर उसकी नजर क्यों नहीं पड़ रही?

[स्थानीय संपादकीय : दिल्ली]




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