यह स्वागतयोग्य है कि उच्चतम न्यायालय के 20 न्यायाधीशों ने अपनी संपत्ति का विवरण सार्वजनिक कर दिया। यह घोषणा न्यायपालिका के प्रति आम आदमी के भरोसे को बढ़ाने और उसकी गरिमा की रक्षा करने वाली है। यह घोषणा शासन-प्रशासन में पारदर्शिता लाने की मुहिम को बल प्रदान करने के साथ इस भाव का संचार करने में भी समर्थ होनी चाहिए कि लोकतंत्र किसी को विशिष्ट अधिकारों से लैस होने की अनुमति नहीं देता। सच तो यह है कि किसी को ऐसे अधिकार की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। यह आश्चर्यजनक है कि उच्चतम न्यायालय ने जाने-अनजाने ऐसी ही प्रतीति कराई। अब आवश्यक यह है कि उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की ताजा पहल एक परंपरा में परिवर्तित हो, ताकि कल को कोई किसी भी आधार पर संपत्ति की घोषणा से इनकार न कर सके। इस संदर्भ में न्यायाधीश बीएन का आचरण जितना उल्लेखनीय है उतना ही अनुकरणीय भी, जिन्होंने सेवानिवृत्त होने के बाद भी संपत्ति की घोषणा की। उनकी इस पहल से स्वत: यह सिद्ध होता है कि न्यायाधीशों का एक वर्ग पहले ही संपत्ति की घोषणा के लिए सहर्ष तैयार था। यह निराशाजनक है कि न्यायाधीशों की संपत्ति की घोषणा का मुद्दा अदालत तक पहुंचा। इस मसले पर मुकदमेबाजी में पड़ने की तो कहीं कोई आवश्यकता ही नहीं थी।
फिलहाल यह कहना कठिन है कि न्यायाधीशों की ओर से संपत्ति की घोषणा के साथ ही सूचना अधिकार संबंधी याचिकाओं के कारण उपजे उस विवाद का पटाक्षेप हो गया जिसमें उच्चतम न्यायालय के जजों की संपत्तियों के बारे में जानकारी चाही गई थी और जिसे लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय में कानूनी लड़ाई लड़ी गई। इस लड़ाई ने विचित्र स्थिति पैदा कर दी थी। उच्चतम न्यायालय के रुख के कारण आम जनता के मन में यह सवाल कौंधने लगा था कि आखिर न्यायाधीश अपनी संपत्ति का विवरण गोपनीय क्यों रखना चाहते हैं? उच्चतम न्यायालय ने इस मामले पर उच्च न्यायालय में कठोर रुख अपनाते हुए जिस तरह यह दलील दी थी कि न्यायाधीश किसी प्रावधान के तहत नहीं आते उससे आम जनता के बीच कोई सही संदेश नहीं गया। यह खेदजनक है कि जब न्यायाधीशों को आगे बढ़कर आम आदमी को राह दिखाने के साथ एक उदाहरण पेश करना चाहिए था तब उन्होंने खुद को सूचना अधिकार के दायरे से बाहर रखने के संकेत दिए। यह समय की मांग है कि शीर्ष न्यायपालिका सूचना अधिकार के प्रति सकारात्मक रवैया अपनाए, क्योंकि इस अधिकार के तहत अभी कई अर्जियां उच्चतम न्यायालय में अटकी हुई हैं। जिस तरह संपत्ति की घोषणा के मामले में पारदर्शिता आवश्यक है उसी तरह न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया के मामले में भी। इसके अतिरिक्त न्यायिक सुधारों के मामले में भी यह अपेक्षित ही नहीं, बल्कि अनिवार्य है कि न्यायपालिका उन उपायों पर अमल करने के लिए तत्पर दिखे जो एक लंबे अर्से से चर्चा में हैं तो, लेकिन धरातल पर नहीं उतर पा रहे हैं। आखिर कार्यपालिका और न्यायपालिका कब तक न्यायिक तंत्र के सुधारों पर निरर्थक चर्चा करते रहेंगे? अब यह चर्चा न केवल ऊब पैदा करने लगी है, बल्कि यह संकेत भी देने लगी है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे की जिम्मेदारी का उल्लेख कर कर्तव्य की इतिश्री कर लेना चाहते हैं। यह स्थिति सजग, सक्रिय और संवेदनशील व्यवस्था का परिचायक नहीं। यदि समय पर आवश्यक कार्य न हों तो समस्याएं जटिल होने के साथ अन्य अनेक विसंगतियां भी पैदा करती हैं।
[मुख्य संपादकीय]