माध्यमिक विद्यालयों में तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों की नियुक्ति में धांधली का मामला हैरान अवश्य करता है, लेकिन उत्तर प्रदेश में ऐसा होना कोई नई-अनोखी बात नहीं। इस मामले में धांधली होने की पुष्टि इसलिए हो रही है, क्योंकि तृतीय-चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए जिला विद्यालय निरीक्षकों ने शासन को भी अवगत कराना आवश्यक नहीं समझा। संदेह का एक अन्य कारण इन पदों की भर्ती के लिए विज्ञापन न जारी करना भी है। वैसे यह संभव नहीं जान पड़ता कि इन नियुक्तियों के संदर्भ में शासन बिल्कुल अनजान रहा हो और यदि वास्तव में शासन को भनक लगे बिना ही नियुक्तियां कर ली गईं तो यह अंधेरगर्दी की पराकाष्ठा है। इसका मतलब है कि या तो शासन की शिक्षा प्रशासन पर तनिक भी पकड़ नहीं या फिर उसे इसकी परवाह ही नहीं कि उसकी नाक के नीचे क्या हो रहा है?
जब तक किसी भी विभाग की भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी ढंग से नहीं होगी तब तक नियुक्तियों में घपला-घोटाला रुकने वाला नहीं है। उत्तर प्रदेश में जब निर्धारित प्रक्रिया का पालन करने के क्रम में रिश्वत लेकर अपात्र लोगों को नौकरियां दे दी जाती हैं तब गुपचुप तरीके से की जाने वाली भर्तियों में गड़बड़ियों के अलावा और कुछ हो ही नहीं सकता। इस पर आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता कि शिक्षा मंत्री ने मामले की जांच कराने की घोषणा की है, क्योंकि ऐसे मामलों में न जाने कितनी बार जांच के नाम पर लीपापोती की जा चुकी है। राज्य सरकार को एक और भर्ती घोटाले से यह अहसास हो जाए तो अच्छा कि ऐसे प्रकरण उसकी छवि को दागदार बनाने के साथ-साथ आम जनता के भरोसे को भी डिगाते हैं। इस घोटाले पर शासन के स्तर पर जो भी सफाई दी जाए वह अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। शिक्षा विभाग को यह स्पष्ट करना ही होगा कि जब बिना विज्ञापन निकले और अन्य औपचारिकताएं पूरी किए भर्तियां हो रही थीं तब वह क्या कर रहा था? ध्यान रहे कि शिक्षा विभाग अपने स्तर पर इस घोटाले का भंडाफोड़ भी नहीं कर सका।
[स्थानीय संपादकीय: उत्तर प्रदेश]