स्नान से जुड़ी आस्था के बड़े पर्वो में एक है कार्तिक पूर्णिमा। इसी दिन गुरु नानक देवजी का प्रकाशोत्सव (जयंती) भी पड़ता है। पटना में गंगातट और हाजीपुर में गंगा-गंडक के संगम पर पवित्र स्नान के लिए लाखों श्रद्धालु आते हैं। पटना साहिब स्थित तख्त हरिमंदिर जी में मत्था टेकने के लिए भी गुरु के हजारों बंदे पहुंचते हैं। हाजीपुर के सोनपुर में पूर्णिमा से ही हरिहर क्षेत्र का मेला शुरू होता है। गज मुक्ति की पौराणिक कथा से जुड़ कर लगने वाले इस मेले ने कालान्तर में प्रदेश की कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था के लिए अपना अलग ही महत्व और आकर्षण रेखांकित कर लिया। पूर्णिमा के दिन पटना या हाजीपुर पहुंचने वाले गरीब-गुरबा आस्तिकों पर बीतने वाली कठिनाइयां हर साल एक जैसी होती हैं। वे सूखे गंवई भोज्य की पोटली और सफर के लिए बुनियादी जरूरत के सामान की गठरी बंाधे पहुंचते हैं। वर्षो पहले गांव छोड़ कर शहरी हो चुके लोगों के लिए आस्तिकों की यह आकस्मिक भीड़ अवांछित होती है। इनके प्रति सम्मान का कोई भाव तो दूर की बात है। अधिकतर आगंतुक किसी के अतिथि नहीं होते।
इधर होटल-गेस्ट हाउस के बढ़ते बाजारवाद में धर्मशालाओं की संस्था लुप्त हो चली है, इसलिए ये अनाहूत लोग पौ फटने से पहले की बची हुई रात किसी फुटपाथ, प्लेटफार्म या मैदान में काटते हैं। कहीं शौच करते हैं, तो कहीं लौटने वाली सवारी का इसी तरह इंतजार करते हैं। इस गरीब देश के एक केंद्रीय मंत्री तो हवाई जहाज के किफायती क्लास को कैटल क्लास बता चुके हैं, लेकिन गंगा स्नान करने के लिए लाखों लोग जिस बस या ट्रेन में सफर करने को विवश होते हैं, उसमें आदमी होने की गरिमा के साथ मंजिल तक पहुंचना वास्तव में कठिन होता है। शासन-व्यवस्था बहुजन की इस वार्षिक दुर्दशा में अपना कोई बड़ा रोल नहीं खोजना चाहती। यह लगभग मान लिया गया है कि यदि लाखों लोग कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान करने की आस्था के साथ ही जीना चाहते हैं, तो इसकी फजीहत उठाना भी उन्हीं की समस्या है, किसी सरकार का सरदर्द नहीं। यदि ऐसा न होता तो रेलवे और राज्य सरकार के बीच तालमेल से दो दिन के लिए दो तीन मेला स्पेशल ट्रेन चलवाना, संपर्क-रूट पर परिवहन निगम की विशेष बसों की व्यवस्था और पटना, हाजीपुर व सोनपुर के स्कूलों में यात्रियों को दो रात ठहरने की सुविधा देना कौन सी बड़ी बात थी? लगता है कि कुछ आस्थाएं कैटल क्लास में डाल दी गई हैं।
[स्थानीय संपादकीय: बिहार]