यह कम निराशाजनक नहीं कि समय सीमा समाप्त होने के बावजूद राजधानी की सड़कों पर डीजल चालित व्यावसायिक वाहनों का धड़ल्ले से दौड़ना जारी है। अल्टीमेटम देने के बावजूद सरकार द्वारा कोई कदम न उठाना यही दर्शाता है कि वह भारी प्रदूषण फैला रहे इन वाहनों को सड़कों से हटाने के बारे में खुद दुविधा में है। सरकार इन वाहनों को भले ही अब तक तीन बार मोहलत दे चुकी हो, लेकिन सच तो यह है कि मियाद बढ़ाने के अलावा उसने इस दिशा में किसी विकल्प की तैयारी के बारे में न तो सोचा और न ही कोई कदम उठाया। हालांकि सरकार की इस दुविधा को समझना मुश्किल नहीं है। चूंकि इन डीजल चालित वाहनों में से 80 प्रतिशत से अधिक दिल्ली की लाइफ लाइन हैं यानी उनके माध्यम से रोजमर्रा की सब्जी, दूध, ब्रेड, कूड़ा आदि ढोया जाता है, इसलिए सरकार के सामने समस्या यह है कि यदि बिना कोई वैकल्पिक व्यवस्था किए इन्हें सड़कों पर से हटाने का फरमान जारी कर दिया जाता है तो दिल्ली में रोजमर्रा की वस्तुओं के लिए हाहाकार मच जाएगा और इसके लिए दिल्ली सरकार को ही जिम्मेदार ठहराया जाएगा। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब सरकार आवश्यक वस्तुओं की ढुलाई को लेकर इतनी ही चिंतित है तो उसने प्रदूषण फैला रहे वाहनों को तीन बार मोहलत क्यों दी?
क्या इस अवधि में उसने विकल्प तलाशने की कोशिश की? यदि नहीं तो क्यों? क्या इससे सरकार की ढिलाई नहीं साबित होती? दिल्ली की जनता को तहजीब और सिविक सेंस का उपदेश देने वाली मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के पास इस बात का कोई जवाब है कि इन वाहनों के रहते राजधानी में प्रदूषण का स्तर भला कैसे कम होगा? सरकार ने सिर्फ कागजों पर फतवा जारी करने के अलावा इस दिशा में क्या पहल की है? क्या इसके लिए भी अदालत को आगे आकर सरकार को फटकार लगानी होगी और वाहनों को हटाने की समय सीमा तय करनी होगी? एक न एक दिन तो प्रदूषण फैला रहे इन जर्जर वाहनों को सड़कों से हटाना ही होगा, तो फिर दुविधा कैसी?
[स्थानीय संपादकीय: दिल्ली]