नौकरशाहों को संपत्ति की घोषणा की शर्त से बांधने की पहल एक सकारात्मक कदम है। इस पहल को लेकर नौकरशाहों के एक वर्ग की आनाकानी स्वाभाविक है, लेकिन वक्त का तकाजा यह कहता है कि उनकी आपत्तियों को सिरे से खारिज कर दिया जाए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी को भी यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह अपनी विशिष्ट स्थिति रेखांकित कर गोपनीयता के आवरण में दुबका रहे। जब राजनेताओं के लिए संपत्ति की घोषणा आवश्यक है और न्यायाधीशों को भी इसी दायरे में लाया जा रहा है तब फिर इसका कोई औचित्य नहीं कि नौकरशाहों को किसी तरह की रियायत दी जाए। यदि नौकरशाहों को औपचारिक रूप से संपत्ति की घोषणा करने के लिए विवश किया जाता है तो उसके बेहतर नतीजे मिल पाना मुश्किल ही है। व्यवस्था कुछ ऐसी होनी चाहिए जिससे यदि संपत्ति की घोषणा पर कोई सवाल उठाना चाहे तो वह जवाब हासिल कर सके। ऐसे किसी विवरण का कोई मतलब नहीं जो सार्वजनिक तो कर दिया जाए, लेकिन उसके संदर्भ में पूछताछ करने का अधिकार छीन लिया जाए। अन्यथा इस पहल का वैसा ही हश्र होगा जैसा उस नियम का हो रहा है जिसके तहत अधिकारियों के लिए प्रति वर्ष अपनी संपत्ति का ब्यौरा और यहां तक कि तीस हजार रुपये से अधिक की खरीदारी की जानकारी अपने विभाग को देनी होती है। इस जानकारी का कहीं कोई महत्व नहीं है, क्योंकि कोई यह देखने वाला नहीं है कि अधिकारियों की ओर से जो सूचना दी गई है वह सही है या नहीं?
फिलहाल यह कहना कठिन है कि नौकरशाहों के लिए संपत्ति की घोषणा करने की व्यवस्था कब तक और किस रूप में बनेगी, लेकिनयदि यह माना जा रहा है कि ऐसे किसी प्रावधान से भ्रष्टाचार पर लगाम लग जाएगी तो यह सही नहीं। आखिर यह किसी से छिपा नहीं कि राजनेता संपत्ति की घोषणा सार्वजनिक करने के नियम का पालन करते हुए भी अवैध तरीके से करोड़ों रुपये बटोर रहे हैं। ताजा उदाहरण झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा का है, जो चार हजार करोड़ रुपये से अधिक के घपले-घोटाले के केंद्र में हैं। यह कतई राहतकारी नहीं कि मधु कोड़ा अंतत: कानून की गिरफ्त में आए, क्योंकि यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि न जाने कितने ऐसे कोड़ा होंगे जो कानून की निगाह से बचे हुए हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति नौकरशाहों की भी है, जो अपनी संपत्ति की सालाना जानकारी अपने विभाग को देते रहते हैं। तथ्य तो यह है कि केंद्रीय जांच ब्यूरो भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ जब भी कोई अभियान छेड़ता है तो दर्जनों की संख्या में ऐसे अधिकारी सामने आते हैं जिन्होंने ज्ञात स्त्रोतों से कहीं अधिक संपदा अर्जित कर रखी होती है। निश्चित रूप से उच्च पदस्थ व्यक्तियों के भ्रष्टाचार को रोकने के लिए पारदर्शी व्यवस्था के साथ-साथ उपयुक्त कानून भी बनाए जाने चाहिए, लेकिन सबसे अधिक आवश्यक है भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय देना। दुर्भाग्य से बस यही नहीं हो रहा है और यही कारण है कि अनेक घोषणाओं और संकल्पों के बावजूद भ्रष्टाचार बेहिसाब ढंग से बढ़ता चला जा रहा है।
[मुख्य संपादकीय]