उत्तराखंड की राजधानी देहरादून प्रमुख शिक्षा केन्द्र के रूप में चर्चित है। ऐसे में अगर आतंकवादी प्रतिष्ठित स्कूलों को उड़ाने की धमकी देते हैं तो दून प्रशासन का चिंतित होना लाजिमी है। यूं तो देहरादून में कई प्रतिष्ठित स्कूल हैं, लेकिन दून स्कूल और मसूरी के वुडस्टाक स्कूल के नाम तो शुरू से प्रतिष्ठित स्कूलों में शुमार हैं। आतंकवादी जिन पैतरों के साथ अपनी कारगुजारियों को अंजाम दे रहे हैं, वास्तव में वे चिंताजनक हैं। अक्सर उनकी रणनीति का खुलासा तब हो पाता है, जब वारदात हो चुकी होती है। आतंकियों ने अपने संगठन, सहायक एवं उप संगठन तक बना रखे हैं। इन संगठनों को भी अलग-अलग दायित्व सौंपे जाते हैं। इनका अपना खासा नेटवर्क है। उत्तराखंड में भी कई बार आतंकी वारदात करने की धमकी मिली हैं। कभी स्टेशन उड़ाने की धमकी दी जाती है तो कभी देहरादून स्थित रक्षा प्रतिष्ठानों पर उनकी नजर जाती है। यह तो शुक्र की बात है अभी तक कोई भी धमकी कारगर साबित नहीं हो सकी है, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि हम आतंकवादी धमकियों की ओर से गाफिल हो जाएं। जरा सी गफलत गंभीर हादसे में परिणत होते देर नहीं लगती। धमकी को सच मानें तो अब सेंकेंडरी स्कूल आतंकियों के निशाने पर हैं। धमकी मिलते ही प्रशासन जो कदम उठा सकता है, उसने तो उठाये ही हैं, स्कूल प्रबंधनों को भी इस ओर से सतर्क हो जाना चाहिए। प्रशासन ने खतरे के सुराख बंद करने की कोशिश की है, पुलिस एवं पीएसी तैनात की है, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि कालेज प्रबंधन सारा दारोमदार प्रशासन पर छोड़ स्वयं हाथ पर हाथ रखे बैठे रहें। किसी भी तरह की आतंकी वारदात न केवल छात्रों एवं अध्यापकों को नुकसान पहुंचा सकती है, अपितु इससे कालेज की प्रतिष्ठा भी प्रभावित होगी। दूर-दूर से अभिभावक अपने बच्चों को यहां शिक्षा प्राप्त करने के लिए भेजते हैं। इन बच्चों की सुरक्षा का पहला दायित्व भी इन कालेज प्रबंधन पर ही होता है। प्रतिष्ठित कालेजों के प्रबंधतंत्र को चाहिए कि वे स्वयं भी अपनी ओर से बच्चों की सुरक्षा के इंतजाम करें। कालेज प्रबंधतंत्र का पहरा कुछ इस तरह का होना चाहिए कि किसी भी तरह आतंकवादी अपनी साजिश में कामयाब नहीं हो सकें। राज्य सरकार, प्रशासन और कालेज प्रबंधतंत्र तीनों को मिलकर बच्चों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजामात करने चाहिए।
[स्थानीय संपादकीय: उत्तराखंड]