इंतजार की घड़ियां समाप्त हुई और तारीख भी तय हो गई। देर से ही सही हरियाणा मंत्रिमंडल के सदस्य शनिवार को अपने पद की शपथ लेते हुए दिखेंगे। इससे मंत्री बनने के लिए चल रहे जोड़-तोड़ को विराम लग जाएगा। बेहतर होता कि इस मुद्दे पर जल्द निर्णय कर लिया जाता। तमाम आशंकाओं और संदेह को दूर करना जरूरी था। अब मंत्रियों को सारा ध्यान जनता की भलाई की ओर केंद्रित करना होगा। उन्हें बिजली-पानी जैसे बड़े मुद्दों पर काम शुरू करना होगा। राज्य की जनता का सारा ध्यान इन्हीं मुद्दों पर केंद्रित है। चुनाव परिणामों से यह स्पष्ट हो गया कि जनता कांग्रेस के कामों से बहुत ज्यादा संतुष्ट नहीं थी। भूपेंद्र सिंह हुड्डा मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं। निर्धारित समय में सरकार ने सदन में अपना बहुमत सिद्ध कर दिया। इससे निश्चित हो गया कि छह माह तक उसके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पेश नहीं किया जा सकेगा। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत से छह सीटें कम मिली थीं। इससे पहले कोई अन्य निर्दलीय विधायकों को समर्थन के लिए आफर करता कांग्रेस ने रणनीति के तहत सातों को अपने पक्ष में मिला लिया। समर्थकों को इंतजार था कि संसदीय सचिवों और मंत्रियों की सूची में कौन-कौन शामिल होगा। जबकि नाम और उनके विभागों तय नहीं हो पा रहे थे। संशय की स्थिति उत्पन्न होने से मतदाताओं में नई सरकार के प्रति जो उत्साह था, वे मायूस हो गए।
परंपरा यह होनी चाहिए कि जिसे सरकार का नेतृत्व सौंपा जाए, वही अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए मंत्रिमंडल के सहयोगियों की अंतिम सूची तैयार करके विभागों का बंटवारा कर दे। इसके लिए किसने कितने वोट प्राप्त किए हैं यह आधार नहीं हो। योग्यता के अनुसार सहयोगी का आकलन करके विभाग सौंपा जाए। मंत्रिमंडल कर गठन होने के बाद कांग्रेस नेतृत्व को तय करना है कि राज्य की सरकार को पार्टी के जो नेता अस्थिर करने का प्रयास करें उनसे कैसे निपटना है। पार्टी की झोली में कम सीटें आने पर भी समर्थक खुशी मना रहे थे, लेकिन दूसरी ओर पार्टी की अंदरूनी लड़ाई जगजाहिर हो रही थी। आगे सरकार के लिए कोई खतरा न पैदा हो जाए मुख्यमंत्री को अत्यधिक सतर्क रहना होगा। अस्थिरता होने से जन अपेक्षा के काम नहीं हो पाएंगे।
[स्थानीय संपादकीय: हरियाणा]