शिक्षा निदेशालय की इस रिपोर्ट पर बहुत आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि राजधानी के लगभग सभी पब्लिक स्कूलों में गरीब बच्चों के लिए आरक्षित पंद्रह प्रतिशत सीटों में से अधिकांश खाली रहती हैं। दरअसल, फीस के नाम पर अंधाधुंध बढ़ोत्तरी करने वाले पब्लिक स्कूल ऐसा जान-बूझकर करते हैं। सरकार से सस्ती जमीन हथियाने के लिए वे गरीब बच्चों को प्रवेश देने के नाम पर हामी तो भर देते हैं, लेकिन ऐसा करने के नाम पर वे मुकरने लगते हैं। इस मामले में पब्लिक स्कूलों का यह तर्क उचित नहीं माना जा सकता कि गरीब बच्चे उनके यहां प्रवेश लेने आते ही नहीं। उनका यह जवाब गलत तो नहीं है, लेकिन क्या वे यह भी स्पष्ट करने का कष्ट करेंगे कि क्या उन्होंने गरीब बच्चों के लिए आरक्षित सीटों पर प्रवेश लेने के लिए उन्हें कभी प्रोत्साहित करने की कोशिश की? यह हर कोई जानता है कि गरीब जिस तरह रईस लोगों की कोठियों-हवेलियों के आसपास भी फटकने से सहमते हैं, उसी तरह महंगे पब्लिक स्कूलों की चकाचौंध से भी वह भयाक्रांत रहते हैं। ऐसे में क्या यह उम्मीद की जा सकती है कि वे खुद पहल करके पब्लिक स्कूलों से अपना अधिकार मांगने जाएंगे?
हालांकि इस स्थिति के लिए शिक्षा निदेशालय और राज्य सरकार भी कम दोषी नहीं। पब्लिक स्कूलों को सस्ती जमीन आवंटित करने के बाद उनकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए क्या सरकार की तरफ से कोई पुख्ता व्यवस्था की गई है? आखिर यह कौन देखेगा कि पब्लिक स्कूल गरीब बच्चों के लिए आरक्षित सीटों पर उन्हें प्रवेश दे रहे हैं या नहीं? अगर ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है तो फिर पब्लिक स्कूल गरीब बच्चों को प्रवेश देने में रुचि क्यों लेंगे? जब ऐसे स्कूल और इनमें पढ़ने-पढ़ाने वाले कथित आभिजात्य लोग गरीबों के नाम पर ही नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं तो क्या स्कूलों में अपने साथ गरीब बच्चों को बैठाना उन्हें गवारा होगा? गरीबों को इस आरक्षण का लाभ तो तभी मिलेगा जब ऐसे स्कूल खुले दिल से उन्हें आमंत्रित करेंगे और भाईचारे के माहौल को बढ़ावा देने का प्रयास करेंगे। सरकार को भी कोई ऐसा निगरानी तंत्र बनाना चाहिए जो पब्लिक स्कूलों की गतिविधियों पर न केवल नजर रखे, बल्कि नियमों के पालन के लिए उन पर दबाव भी बनाए।
[स्थानीय संपादकीय: दिल्ली]