कर्नाटक का नाटक

 
Nov 07, 11:48 pm

कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येद्दयुरप्पा की आंखों में आंसू भाजपा की बेबसी का परिचायक हैं। यह बेबसी धनबल की राजनीति को अपनाने और उसे बढ़ावा देने का दुष्परिणाम है। येद्दयुरप्पा के लिए सिरदर्द बन गए रेड्डी बंधुओं ने जिस तरह भाजपा नेतृत्व और यहां तक कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भी सुनने से इनकार कर दिया उससे यह साफ है कि वे ब्लैकमेलिंग पर उतर आए हैं। लज्जाजनक यह है कि खुद को मूल्यों, आदर्शो और सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध बताने वाली भाजपा इस ब्लैकमेलिंग के समक्ष नतमस्तक दिख रही है। यदि ऐसा नहीं होता तो येद्दयुरप्पा की ओर से नरमी बरतने के बावजूद वे उन्हें हटाने की एकसूत्रीय मांग पर नहीं अड़े होते। राजनीति को अपना कारोबार बनाने वाले रेड्डी बंधु जिस तरह 40 विधायकों के साथ हैदराबाद में डेरा डाले हुए हैं और भाजपा नेतृत्व उनके खिलाफ कुछ कर नहीं पा रहा उससे तो यही संकेत मिलता है कि वह उनके समक्ष असहाय है। इसकी पुष्टि इससे भी होती है कि रेड्डी बंधुओं के साथ हुए कथित समझौते के तहत येद्दयुरप्पा को अपमान के कड़वे घूंट पीने पड़े। रेड्डी बंधु बड़े कारोबारी हो सकते हैं और धन बल के जरिये 40-50 विधायकों को भी अपने पाले में रख सकते हैं, लेकिन देश जानना चाहेगा कि आनन-फानन में अरबपति बनने के अलावा उनकी क्या खासियत है?

कर्नाटक का संकट रेड्डी बंधुओं के इर्द-गिर्द केंद्रित होना और येद्दयुरप्पा तथा भाजपा नेतृत्व का उनके समक्ष असहाय नजर आना यह भी बताता है कि कर्नाटक में धनबल की राजनीति अपने चरम पर है। इस स्थिति के लिए भाजपा किसी और को दोष नहीं दे सकती, क्योंकि राजनीति में रेड्डी बंधुओं को बढ़ावा देने का काम उसके ही नेताओं ने किया। धनबल की राजनीति के प्रतीक रेड्डी बंधु भाजपा के लिए जिस तरह भस्मासुर बन गए हैं उससे अन्य राजनीतिक दलों का आनंदित होना स्वाभाविक है, लेकिन यह स्थिति भारतीय राजनीति के समक्ष उपस्थित एक गंभीर खतरे की अनदेखी ही अधिक होगी। भारतीय राजनीति में धनबल की भूमिका जिस तरह बढ़ती चली जा रही है उसने राजनीति के मायने ही बदल दिए हैं। चुनाव लड़ने के लिए टिकट हासिल करने से लेकर सरकार गठन तक में धनबल का जैसा बोलबाला रहता है वह किसी से छिपा नहीं और यह तो न जाने कब से जगजाहिर है कि भारत की चुनावी राजनीति कालेधन पर आश्रित है। सभी राजनीतिक दल इस सच्चाई से परिचित हैं, लेकिन वे रेड्डी बंधुओं सरीखे लोगों को ही राजनीति में आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन के लिए रेड्डी बंधुओं की ओर से छेड़े गए अभियान का जो भी हश्र हो, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि वे भाजपा नेतृत्व की कमजोरी का लाभ उठा रहे हैं। येद्दयुरप्पा का ताजा बयान तो यह भी बता रहा है कि भाजपा के कुछ बड़े नेता रेड्डी बंधुओं के हमदर्द बने हुए हैं। यह हमदर्दी भाजपा को बहुत महंगी पड़ेगी। यदि कर्नाटक में रेड्डी बंधुओं की चलती है तो भाजपा वहां सरकार बचाने में भले ही सफल हो जाए, वह अपनी बची-खुची साख भी खो देगी।

[मुख्य संपादकीय]




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