गंगा को प्रदूषण से बचाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने 20 नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करने का गंगा नदी घाटी प्राधिकरण को जो प्रस्ताव सौंपा उससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता। राज्य सरकार की इस पहल से यह नहीं माना जा सकता कि सरकारी मशीनरी गंगा को प्रदूषण से मुक्त बनाने के लिए सचेत हो गई है। यदि राज्य सरकार गंगा को साफ-सुथरा रखने के लिए वास्तव में प्रतिबद्ध होती तो न तो 20 नए सीवेज ट्रीटमेंट स्थापित करने की जरूरत पड़ती और न ही पहले से चल रहे एसटीपी के संदर्भ में यह सामने आता कि उनमें से आधे या तो अपनी पूरी क्षमता के मुताबिक काम नहीं कर पा रहे हैं या फिर बंद पड़े हैं। फिलहाल यह कहना कठिन है कि जिन नए एसटीपी की स्थापना का प्रस्ताव किया गया है वे कब तक संचालित होंगे? गंगा को प्रदूषण से मुक्त बनाने के लिए प्रशासनिक तंत्र का जैसा ढर्रा रहा है उसे देखते हुए इसके प्रति आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता कि पहले से स्थापित संयंत्र अपनी पूरी क्षमता से कार्य करने लगेंगे। इस संदर्भ में यह किसी से छिपा नहीं कि उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय की तमाम सख्ती के बावजूद प्रशासनिक तंत्र गंगा नदी के प्रदूषण को दूर करने के लिए अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखा रहा है। इसका प्रमाण यह है कि करोड़ों रुपये व्यय कर दिए जाने के बावजूद गंगा का प्रदूषण कम होना तो दूर रहा, और अधिक बढ़ता जा रहा है। इससे अधिक निराशाजनक और क्या होगा कि अनेक घोषणाओं के बावजूद अभी भी उन उद्योगों पर अंकुश नहीं लग सका है जो अपनी गंदगी गंगा में उड़ेल रहे हैं। ऐसा नहीं है कि प्रशासनिक तंत्र इस तथ्य से परिचित न हो कि गंगा के किनारे स्थित उद्योग इस नदी का प्रदूषण बढ़ा रहे हैं। दरअसल बात केवल गंगा नदी की नहीं है, बल्कि यमुना और अन्य अनेक नदियों की भी है। ज्यादातर नदियों में प्रदूषण बढ़ता जा रहा है, लेकिन शासन-प्रशासन की ओर से उन कारणों के निवारण की प्रतिबद्धता नहीं प्रदर्शित की जा रही है जो नदियों को प्रदूषित करने का काम कर रहे हैं। वास्तव में नदियों को प्रदूषण मुक्त करने की योजनाएं इसीलिए धन की बर्बादी सिद्ध हो रही हैं, क्योंकि उनकी कहीं कोई निगरानी नहीं हो रही है।
[स्थानीय संपादकीय: उत्तर प्रदेश]