प्रदेश में बड़ी वैचारिक मुग्धता के भाव से पंचायतीराज व्यवस्था लागू की गई है। इसका दूसरा पहलू यह है कि इसके जरिये रिश्वत लेने की लालसा का विकेंद्रीकरण गांव तक हो गया। अपवाद को छोड़ दें, तो सामान्य धारणा है कि मुखिया जी इंदिरा आवास तक के लिए घूस लेने से नहीं हिचकते। रेट तय कर रखा है-एक आवास के लिए चार-पांच हजार रुपये। गत शुक्रवार को यह बात एकदम से पुष्ट हुई, जब विजिलेंस ब्यूरो ने राज संझौली के मुखिया को 4000 रुपये लेते रंगेहाथ पकड़ा। जिस शख्स से घूस ली जा रही थी, वह विकलांग और गरीब है। आदमी की इतनी दयनीयता भी अब किसी को फटाफट अमीर बनने के कुपथ से विचलित नहीं करती! जीवन में हर तरह से भौतिक सुख के अधिकाधिक साधन जुटाने की चाह इतनी प्रबल हो चुकी है कि सदियों पुराने नीति उपदेश, विभिन्न धर्मो की आचार-संहिता और आधुनिक शासन प्रणाली के नियम-कानून या बार-बार संशोधित दंड विधान भी इस प्रवृत्ति को संयमित रखने में ज्यादा कारगर नहीं हो पाते। ईश्वर या कानून का भय इतना कम होता गया है कि अनुचित कमाई जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है।
उदाहरण की कमी नहीं है। विजिलेंस ब्यूरो ने गुरुवार को फुलवारीशरीफ अंचल के राजस्व कर्मचारी को रिश्वत लेते गिरफ्तार किया। वह जमीन के दाखिल-खारिज के लिए रिश्वत की दूसरी किस्त के रूप में हजार रुपये ले रहा था। बनमनखी (पूर्णिया) प्रखंड में केन्द्र प्रायोजित एसजीआरवाई एवं काम के बदले अनाज योजना का 11755 क्विंटल, 71 किलो 355 ग्राम चावल गायब हो गया। यह भी पोर-पोर भ्रष्टाचार का नतीजा है। दरअसल, सरकारी सेवा में पद के अनुसार भ्रष्ट होने की गुंजाइश सबसे ज्यादा है, क्योंकि यहां इस करतूत पर दंडित किये जाने की प्रक्रिया काफी जटिल और लंबी है। राज्य सरकार ने स्वच्छ प्रशासन देने के मकसद से विगत 3 नवंबर 09 से सतर्कता सप्ताह, यानी लोकसेवकों के 'शपथ पर्व' की शुरुआत की। पहले ही दिन दो रिश्वतखोर दबोचे गये। अब इस बात पर बहस हो सकती है कि यह जांच एजेंसी (विजिलेंस ब्यूरो) की सक्रियता का सुफल था या इसके बेमानी होने का सुबूत? आखिर क्यों इस मुद्दे पर इतनी तेजी के बावजूद घूस लेने वालों में कानून का कोई डर पैदा नहीं हो सका? शायद यह सप्ताह भी इस कड़वे सच को ही दोहरायेगा कि लक्जरी लाइफ स्टाइल जीने की जिद में कानून और कसम तोड़ना अधिकतर सरकारी सेवकों के लिए निहायत छोटी बात है।
[स्थानीय संपादकीय: बिहार]