कुंभ कार्यो की धीमी रफ्तार कई सवाल उठा रही है। राज्य सरकार ने 31 अक्टूबर तक कुंभ कार्यो को पूर्ण करने की समय सीमा तय की थी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 20 अक्टूबर तक कुंभ के लिए आवंटित 254 योजनाओं में से मात्र 23 ही पूरी हो पाई हैं। मतलब यह है कि निर्धारित समय सीमा से ग्यारह दिन पहले मात्र नौ प्रतिशत कार्य पूरे हो सके। गौरतलब बात यह है कि कई विभागों को अच्छी खासी रकम आवंटित कर दी गई है, लेकिन अभी तक उन्होंने कुछ भी खर्च नहीं किया है। उन्नीस विभागों को कुंभ के कार्य आवंटित किए गए हैं। आठ विभागों की प्रगति शून्य है। कुंभ कार्यो के लिए शासन द्वारा स्वीकृत 428 करोड़ में से 20 अक्टूबर तक 177 करोड़ ही खर्च हो पाएं। एक तरफ कार्यो की गति इस कदर धीमी है, दूसरी तरफ निर्माण घटिया होने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। अगले वर्ष की शुरुआत में ही होने जा रहे कुंभ में आधे अधूरे कार्य और उनका भी घटियापन उत्तराखंड की प्रतिष्ठा पर सवाल उठाएगा। जहां तक कुंभ कार्यो के लिए धनराशि का सवाल है अब तक 313 करोड़ से अधिक की राशि अवमुक्त हो चुकी है। इस लिहाज से धन की उपलब्धता का संकट नहीं दिखाई देता है, संकट काम करने वाले विभागों की धीमी चाल का है। हालांकि इन कुंभ कार्यो का प्रभाव बाकी राज्य के विकास पर पड़े बिना नहीं रहेगा। कुंभ के लिए 400 करोड़ रुपये देने का दावा करने के बाद केंद्र सरकार ने राज्य को एक बड़ा झटका दिया है। कुंभ के लिए यह राशि अलग से न देकर राज्य को मिलने वाली केंद्रीय सहायता को कुंभ कार्यो में समायोजित किया गया है। छठा वेतनमान देने की वजह से संसाधनों के लिए पहले से ही जूझ रहे उत्तराखंड राज्य के विकास के लिए मिलने वाली 330 करोड़ की राशि कुंभ में लग गई, अब राज्य के विकास के लिए संसाधन कहां से आएंगे।
[स्थानीय संपादकीय: उत्तराखंड]