यह कम निराशाजनक नहीं कि राजधानी में शुरू की गई विकास परियोजनाओं में से अधिकांश बजट की कमी के कारण मझधार में फंसी हुई हैं। इनमें से ज्यादातर परियोजनाएं लोक निर्माण विभाग से संबंधित हैं। जाहिर है कि पर्याप्त बजट न होने के कारण इन परियोजनाओं के समय से पूरा होने में संदेह है। यह स्थिति तब है जब राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी अपने अंतिम चरण है और इन खेलों से संबंधित कई परियोजनाओं के भी समय से पूरा न हो पाने की आशंका जताई जा रही है। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और लोक निर्माण मंत्री राजकुमार चौहान भले यह दावा करें कि परियोजनाओं के लिए न तो फंड की कमी होने दी जाएगी और न ही गुणवत्ता से कोई समझौता किया जाएगा, लेकिन व्यावहारिक स्थिति इसके विपरीत ही दिखाई दे रही है। परियोजनाओं के रुके होने या धीमी गति से चलने के कारण उनके दावे खोखले ही प्रतीत हो रहे हैं। यह ठीक है कि राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन के चलते दिल्ली सरकार का बोझ काफी बढ़ गया है, पर सही रणनीति बनाकर और फंड का उचित विभाजन कर स्थिति पर नियंत्रण पाया जा सकता था।
सवाल यह भी है कि सरकार की वित्तीय स्थिति इतनी डावांडोल क्यों है? परियोजनाओं में देरी होने के कारण इनकी लागत में कई गुना वृद्धि ने समस्या और बढ़ा दी है। दिल्ली सरकार विकास कार्यो को आगे बढ़ाने का दावा तो कर रही है, लेकिन हाथ तंग होने के कारण वह किसी विभाग को धन भी नहीं आवंटित करना चाहती। जाहिर है ऐसी स्थिति में विकास कार्य प्रभावित होंगे ही। इस धर्म संकट के लिए मुख्यत: सरकार को ही दोषी माना जा सकता है जिसने अति उत्साह में पहले तो न केवल अंधाधुंध योजनाएं बनाई बल्कि उनके लिए शुरुआती बजट भी जारी कर दिया, लेकिन समुचित निगरानी न होने के कारण वे लेट होती चली गई और बजट बढ़ गया। आखिर जो परियोजनाएं चल रही हैं, सरकार ने उन्हें समय से पूरा कराने का कोई दबाव बनाने का प्रयास क्यों नहीं किया? ऐसा न करके सरकार ने अपने हाथों अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का काम किया है। वित्तीय संकट से बौखलाई सरकार ने अंतत: जनता से ही पैसा वसूलने का फैसला किया है, लेकिन सरकार विवेकपूर्ण ढंग से योजनाएं कब बनाएगी?
[स्थानीय संपादकीय: दिल्ली]