2जी स्पेक्ट्रम के लाइसेंस रद करने वाली उच्चतम न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ के सदस्य रहे न्यायाधीश एके गांगुली ने अपने फैसले को न्यायिक अधिकारों से परे बताने संबंधी तर्को को जिस तरह खारिज किया उससे आलोचकों की आंखें खुल जानी चाहिए। यह आश्चर्यजनक है कि स्पेक्ट्रम आवंटन में मनमानी से भली तरह अवगत होने के बावजूद कुछ लोग इस तर्क की आड़ लेने की कोशिश कर रहे हैं कि उच्चतम न्यायालय को कार्यपालिका की नीतियों और फैसलों में हस्तक्षेप का अधिकार नहीं। इस तर्क को मान्यता देने का अर्थ है, कार्यपालिका को मनमानी करने की खुली छूट प्रदान करना। इस छूट के दुष्परिणाम केवल स्पेक्ट्रम आवंटन में घोटाले के रूप में ही देखने को नहीं मिले। इसके पहले केंद्रीय सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति के मामले में भी यह स्पष्ट हुआ था कि कार्यपालिका ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर एक दागदार अधिकारी को उच्च पद पर बैठाने की कोशिश की। यह एक पहेली ही है कि पीजे थॉमस को केंद्रीय सतर्कता आयुक्त बनाने पर अपनी भूल स्वीकार करने वाली सरकार स्पेक्ट्रम आवंटन के मामले में ऐसा कोई भाव प्रदर्शित करने से क्यों बच रही है? यह दयनीय है कि केंद्र सरकार के प्रतिनिधि और प्रवक्ता व्यर्थ में ही यह साबित करने में लगे हुए हैं कि 2जी स्पेक्ट्रम के मनमाने आवंटन में सारा दोष तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा का ही था और उनकी कारगुजारी से सरकार का कोई लेना-देना नहीं। यह उच्चतम न्यायालय के फैसले की विचित्र व्याख्या तो है ही, देश को गुमराह करने की कोशिश भी है। शायद इसीलिए न्यायाधीश गांगुली को यह टिप्पणी करनी पड़ रही है कि स्पेक्ट्रम घोटाला शासन की विफलता का दुष्परिणाम था। यदि राजा की कारगुजारी की जिम्मेदारी संप्रग सरकार नहीं लेगी तो फिर कौन लेगा? आखिर ऐसा भी नहीं है कि वह अपने आप दूरसंचार मंत्री बन गए हों या फिर घटक दल का सदस्य होने के नाते उन्हें मनमाने तरीके से काम करने की सुविधा मिली हुई थी।
केंद्रीय सत्ता के प्रतिनिधियों की ओर से दिए जा रहे इन तर्को का अब कोई मूल्य-महत्व नहीं रह गया है कि उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में सरकार को दोषी नहीं ठहराया है। यदि इस फैसले में सरकार के खिलाफ टिप्पणियां नहीं की गई हैं तो इसका यह मतलब भी नहीं कि उसकी सराहना की गई है। जिस सरकार ने स्पेक्ट्रम घोटाला सामने आने के बाद राजा का बचाव किया हो और इस कोशिश में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रपट खारिज करने की भी कोशिश की हो वह किस मुंह से यह कह सकती है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला उसकी सेहत पर कोई असर नहीं डालता? स्पेक्ट्रम आवंटन पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की मनमानी व्याख्या करके चाहे जैसा दुष्प्रचार क्यों न किया जाए, केंद्र सरकार को कुछ हासिल होने वाला नहीं है। यह तो वह रवैया है जो उसकी छवि और अधिक खराब करेगा। जानबूझकर की गई गलती को सही बताने की कोशिश करना अहंकार के अतिरिक्त और कुछ नहीं। केंद्र सरकार के नीति-नियंताओं को इससे अवगत होना चाहिए कि देश की जनता अपनी भूल स्वीकार करने वाले नेताओं को तो माफ कर सकती है, लेकिन अहंकार का प्रदर्शन करने वालों को वह दंडित ही करती है। यदि केंद्र सरकार अपनी छवि सुधारने के लिए तनिक भी सजग है तो उसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले की शरारतपूर्ण व्याख्या करने से बाज आना चाहिए।
[मुख्य संपादकीय]
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