
ओलंपिक खर्च एवं इस आयोजन को भव्यता देने के मामले मे चीन ने अन्य सभी देशों को पीछे छोड़ दिया है। ओलंपिक तैयारियों पर चीन ने अब तक 42 अरब डालर खर्च किए है। महज दो हफ्ते चलने वाले ओलंपिक आयोजन पर इतनी बड़ी राशि खर्च करना आमतौर पर किसी विकासशील देश के लिए आसान नहीं है, पर चीन का मामला काफी अलग है। यह ओलंपिक खर्च चीन के सकल घरेलु उत्पाद का एक छोटा सा अंशमात्र है। वैसे ओलंपिक खर्च की तमाम चर्चाओं के बीच गौर करने लायक है कि चीन ने अधिकांश राशि बुनियादी ढांचे पर खर्च की है। आलोचकों का कहना है कि चीन में पिछले 30 सालों में तेजी से आर्थिक विकास हुआ है, पर आज भी लाखों लोग गरीबी की मार झेल रहे है। इनका तर्क है कि चीन की सरकार ने ओलंपिक आयोजन को भव्यता प्रदान करने की होड़ में स्वास्थ्य सेवाओं एवं सामाजिक कल्याण के कार्यों को पीछे छोड़ दिया है। वैसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार एवं आर्थिक लाभ की दृष्टि से चीन के इस फैसले को खारिज नहीं किया जा सकता। जर्मनी में मेंज स्थित जोहान्स गुटनबर्ग यूनीवर्सिटी में स्पोर्ट्स इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर होल्गर प्रीयस कहते है कि अगर आप भविष्य में बेहतर व्यापार सुनिश्चित करने की योजना के तहत अपनी छवि बदलना चाहते है, तो आपको ओलंपिक खेल या फिर ऐसा ही कोई मौका चाहिए।
बीजिंग ओलंपिक रिसर्च सेंटर के मुताबिक चीन ने स्टेडियम एवं अन्य खेल सुविधाओं, ऑपरेशन और सुरक्षा पर 4.64 अरब डालर, पर्यावरण सुरक्षा के उपायों पर 10 अरब डालर खर्च किए है। खास बात यह है कि सड़कों एवं राजमार्ग निर्माण सहित बुनियादी ढांचे के विकास पर सबसे ज्यादा 26 अरब डालर खर्च किया गया है। ओलंपिक के इस बढ़ते खर्च से अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के सदस्य भी चिंतित हो उठे है और उन्होंने इसे सीमित करने के उपायों पर विचार करना आरंभ कर दिया है। सदस्यों का कहना है कि ओलंपिक खेलों का खर्च कम करना जरूरी हो गया है, ताकि दुनिया के विभिन्न शहरों में ओलंपिक आयोजन को मुमकिन किया जा सके। वर्तमान में ओलंपिक पर 50 अरब डालर खर्च करने का सामर्थ्य चुनिंदा दस शहरों में ही नजर आता है। बीजिंग ओलंपिक के भारी खर्च के विषय में अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के एग्जीक्यूटिंव डायरेक्टर गिलबर्ट फेली कहते है कि ओलंपिक आयोजन पर भारी खर्च का निर्णय चीन ने स्वेच्छा से लिया है। उनके मुताबिक चीन का ओलंपिक खर्च ज्यादा प्रतीत हो रहा है, क्योंकि चीन में सरकार ने ऐसे कार्यों को भी करने का बीड़ा उठाया है, जिन्हे अन्य मेजबान शहरों में पूरा करने का भार निजी क्षेत्र पर है, या यह भी कहा जा सकता है कि ऐसे कार्यो की जरूरत ही नहीं है। दरअसल विकसित देशों का बुनियादी ढांचा पहले से ही इतना विकसित है कि उसपर खर्च करने की जरूरत ही नहीं रह जाती है।
बहरहाल ओलंपिक आयोजन के जरिए चीन पूरी दुनिया को अपनी ओर आकर्षित करना चाहता है। इसमें वह काफी हद तक सफल भी रहा है पर चीन के सिचुआन प्रांत में भूकंप से उपजी तबाही के मद्देनजर बुद्धिजीवी वर्ग यह कहने में पीछे नहीं है कि सरकार को दुनिया के आगे रंग जमाने से ज्यादा देशवासियों की भलाई के कार्यो पर खर्च करना चाहिए।
[कीर्ति सिंह]