शगुनां दियां निशानियां..

 
Nov 06, 11:23 pm

शगुन का तारा चढ़ते ही लाल चूड़े के साथ कलाइयों पर सजने लगे हैं कलीरें। शगुन, संस्कृति और सुंदरता का अद्भुत संगम कलीरें अब कौड़ियों और नारियल गिरी से ही नहीं बनते, बल्कि ड्रेस के मैचिंग डिजाइनर कलीरें ज्यादा पसंद किए जा रहे हैं। जबकि सदाबहार हैं सोने और चांदी के कलीरे।

[पुरानी है परंपरा]

कलीरें जम्मू-कश्मीर में होने वाले शादी-ब्याह का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। सांत के हवन के बाद जब दुल्हन को उसकी मामी सुहाग का चूड़ा चढ़ाती है, उसी वक्त उसकी कलाई में बंधता है सबसे पहला कलीरा। इसके बाद तो वधू पक्ष के तमाम रिश्तेदार ताई, चाची, मौसी, भाभियां, बहनें अपनी-अपनी ओर से वधू की कलाई पर शगुन का कलीरा बांधती हैं। अविवाहित बहनें एक कलीरा जबकि विवाहित स्त्रियां कलीरों का जोड़ा दुल्हन की दोनों कलाइयों पर बांधती हैं। कलीरें बांधने की इस परंपरा में कई बार तो कलाइयों का भार बहुत ज्यादा हो जाता है।

[कलीरें पहुंचे ससुराल]

दुल्हन के कलीरों पर पहला हक होता है उसकी ननदों का। जितने भी कलीरें दुल्हन की कलाई पर बंधते हैं, उन सबको लटकाकर रखना तो संभव नहीं है। इसलिए कुछ खास कलीरों को कलाई पर बंधा रहने दिया जाता है, जबकि शेष इकट्ठे कर दुल्हन के साथ ससुराल भेज दिए जाते हैं। यहां ननदें भाभी की कलाई से कलीरें खोलती हैं और आए हुए सभी कलीरों को आपस में बांट लेती हैं। हालांकि इन दिनों बहुत सी ननदें भाभी की भावनाओं को समझते हुए उनके पसंदीदा कलीरें नहीं लेतीं। शादी की ये खूबसूरत याद दुल्हन के बेडरूम की शोभा बढ़ाती हैं। आजकल बाजार में कांच के आकर्षक बक्से भी उपलब्ध हैं जिनमें दूल्हे का सेहरा और दुल्हन के कलीरें एक साथ संजोकर रखे जा सकते हैं।

[बदल रहा अंदाज]

पारंपरिक कलीरों में कौड़ियों का इस्तेमाल लड़ के लिए और नीचे लटकाने के लिए नारियल गिरी का इस्तेमाल किया जाता था। उसके बाद कलीरों को हल्का बनाने के इरादे से कौड़ियों की बजाय खील और किशमिश का प्रयोग किया जाने लगा। किसी ने रंगीन कागज के फूल तो किसी ने मोती और घुंघरू भी इस्तेमाल किये। अब ड्रेस के मैचिंग कलीरें फैशन में हैं। इनमें लहंगे में इस्तेमाल हुए जरी और मोती से मिलती-जुलती सामग्री इस्तेमाल की जाती है। गिरी को सौभाग्य से जोड़कर देखा जाता है, इसलिए कलीरों में नारियल गिरी का इस्तेमाल अभी भी जारी है।

[वैष्णों माता के कलीरे]

शादी के बाद अधिकांश जोड़े मां वैष्णों का आशीर्वाद लेने त्रिकुटा पर्वत पर जाते हैं। ये जोड़े मां का धन्यवाद करते हुए वैष्णों माता को कलीरें चढ़ाते हैं। हर रोज हजारों की तादात में कलीरें माता वैष्णों को चढ़ाए जाते हैं। सिर्फ चढ़ाना ही नहीं इन्हें पाना भी मां का आशीर्वाद ही समझा जाता है। इसलिए कुछ लोग अपनी नई गाड़ी पर बांधने के लिए वैष्णों माता के कलीरे आशीर्वाद स्वरूप मांग कर लाते हैं।

[योगिता यादव]




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