टिकट बंटवारे से शुरू हुई कांग्रेस की धड़ेबाजी मुख्यमंत्री के सवाल पर और ज्यादा खुलकर सामने आ गई। आलम यह रहा कि त्रिशंकु जनादेश के कारण स्पष्ट बहुमत न मिलने के बावजूद जोड़-तोड़ कर सरकार बनाने की स्थिति में पहुंची कांग्रेस सातवें दिन अपना नेता विधायक दल फाइनल कर पाई।
बसपा ने त्रिशंकु विधानसभा में सरकार बनाने के लिए समर्थन देकर मानों कांग्रेस को संजीवनी दे दी। तीन निर्दलीय विधायकों के दबाव से आजिज आई कांग्रेस को इससे बड़ी राहत तो मिली, लेकिन साथ ही यह भी सच है कि बसपा के लिए भी कांग्रेस को समर्थन देना मजबूरी बन गया था क्योंकि मायावती अगर यह फैसला न करती तो पार्टी में टूट तय थी।
भाजपा और कांग्रेस जरा सी मेहनत और कर लेते तो शायद दोनों में से किसी एक को सत्ता सुख भोगने के लिए दूसरों की मिन्नत नहीं करनी पड़ती। पांच साल अपनी नीतियों पर सरकार को चलाने के सहज हालात मिलते सो अलग। भाजपा को नौ सीटें और कांग्रेस को सात सीटों पर बेहद मामूली अंतर से हार का मुंह देखना पड़ा। कांग्रेस ने तो एक सीट सौ से भी कम वोटों के अंतर से गंवाई।
दिसंबर माह में रूस की एक अदालत में भगवद्गीता के अनुवादित संस्करण पर पाबंदी लगाने संबंधी एक याचिका दायर किए जाने का मामला खासा चर्चित रहा। इस मामले को लेकर भारत सरकार ने दिल्ली के रूसी राजदूत को तलब भी किया। बहरहाल, रूसी अदालत ने याचिका खारिज कर दी। डरबन में भारत ने जलवायु सम्मेलन में सभी विकल्प खुले रखने का संकेत दिया लेकिन कहा कि किसी भी भावी प्रतिबद्धता से पहले विकसित देशों को और आश्वासन देना होगा।
पूरे बरस गूंजता लोकपाल विधेयक दिसंबर में उस समय ठंडे बस्ते में चला गया जब 29 दिसंबर को संसद के उच्च सदन राज्यसभा की बैठक मध्यरात्रि को अचानक अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई। इसी माह पूर्व सैन्य सचिव लेफ्टिनेंट जनरल अवधेश प्रकाश को सेना की अदालत ने सुकना भूमि घोटाले के सिलसिले में तीन आरोपों का दोषी ठहराया। उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
नई दिल्ली । कहने को तो यह बरस भी हर गुजरते साल जैसा ही था। सबकी उम्र में 365 दिन का वक्फा जोड़कर यह साल विदा हो गया, लेकिन इस साल खास बात यह रही कि साडी दिल्ली को राजधानी बने एक सौ बरस हो गए और हर गुजरते बरस के साथ इसका जोश और रंगत बढ़ती चली गई।...