
मुंबई [ओमप्रकाश तिवारी]। महाराष्ट्र में कांग्रेसनीत सरकार के गठन से पहले ही उसके लिए मुसीबतें खड़ी होने लगी हैं। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा के घोटाले से मुंबई के कुछ नेताओं के जुड़े होने की खबरों के बीच अशोक चह्वाण सरकार के बड़े खनिज भूखंड घोटाले की बात सामने आ रही है। महाराष्ट्र सरकार ने नियमों को ताक पर रखकर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष माणिकराव ठाकरे के गृह जनपद यवतमाल का बेशकीमती खनिज भूखंड कौड़ियों के मोल उनके बेटे के हवाले कर दिया।
यवतमाल के सामाजिक कार्यकर्ता विलास वानखेड़े को सूचना अधिकार कानून के तहत चौंकाने वाली जानकारी मिली। किसानों की सर्वाधिक आत्महत्या वाले विदर्भ क्षेत्र के इस जिले का 422 एकड़ का खनिज संपदा वाला भूखंड प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और जिला कांग्रेस अध्यक्ष के बेटों को कौड़ियों के मोल आवंटित कर दिया गया। इस भूखंड की वास्तविक कीमत करीब 88 करोड़ 40 लाख रुपये है। इस जमीन में छिपे कच्चे चूने, कोयले और डोलोमाइट की कीमत का तो अभी अनुमान लगना बाकी है।
प्राप्त सूचना के अनुसार यवतमाल जिले के झरी जामनी तालुका अंतर्गत डोंगरगांव ग्राम की इस जमीन का मालिकाना हक कभी यहां के मूल निवासी कृष्णा और राघोबा ठाकरे नामक दो भाइयों के पास था। कुछ दशक पहले महाराष्ट्र सरकार ने इस खनिज संपदायुक्त जमीन का अधिग्रहण कर लिया था। करीब दो साल पहले 7 जनवरी 2008 को राज्य सरकार ने इस भूखंड की खनिज संपदा का खनन करने के लिए भूखंड लीज पर देने की अधिसूचना जारी की। जिसके जवाब में सरकार को खनिज क्षेत्र में काम करने वाली अंबुजा सीमेंट, उत्तम स्टील, कुनी लाइम मिनरल्स [उड़ीसा], मोमेंट इस्पात प्रा. लि. दिल्ली जैसी करीब 55 कंपनियों के आवेदन मिले।
इन आवेदनों में एक संयुक्त आवेदन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष माणिकराव ठाकरे के बेटे अतुल और हालिया विधानसभा चुनाव में निर्वाचित यवतमाल जिला कांग्रेस अध्यक्ष वामनराव कासावार के बेटे प्रवीण का भी था। मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण ने विधानसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने से कुछ ही माह पहले यह भूखंड अन्य सभी आवेदनों को नजरअंदाज करते हुए स्थानीय बेरोजगारों को रोजगार देने के नाम पर उक्त दो राजनेता पुत्रों के नाम आवंटित कर दिया।
गौरतलब है कि इस भूखंड के लिए आवेदन करने वालों में उन कृष्णा और राघोजी ठाकरे बंधुओं का पौत्र राजेश ठाकरे भी शामिल था, जिनका कभी इस जमीन पर वास्तविक मालिकाना हक था। राजेश पेशे से इंजीनियर है। राज्य सरकार ने भूखंड का आवंटन करते समय उसके आवेदन पर भी ध्यान नहीं दिया। जबकि, यह परिवार भी माणिकराव व वामनराव की तरह स्थानीय है और अब उसकी माली हालत ज्यादा अच्छी नहीं है।
पता चला है कि इस बेशकीमती भूखंड को पाने के लिए अतुल और प्रवीण का आवेदन राज्य सरकार को आवंटन की अधिसूचना जारी होने की तारीख से पहले ही प्राप्त हो गया था। अधिसूचना जारी होने के बाद उनकी ओर से कोई आवेदन किया ही नहीं गया। इससे साफ होता है कि उक्त अधिसूचना व्यक्ति विशेष को ही भूखंड आवंटित करने के लिए खानापूरी के तौर पर जारी की गई थी। नेतापुत्रों को भूखंड देने का निश्चय तो सरकार पहले ही कर चुकी थी।
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