अस्वाभाविक मौत नियति है भुट्टो परिवार की

 
Dec 28, 01:42 am

इसलामाबाद। अस्वाभाविक मौत। यह नियति है भुट्टो परिवार की। सबसे पहले जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी दी गई। फिर दो भाइयों की हत्या हुई। अब बेनजीर इस कड़ी की चौथी शिकार बनीं।

दुखद त्रासदी से इस परिवार का पहली बार सामना उस वक्त हुआ जब बेनजीर के पिता और पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को चार अप्रैल 1979 को फांसी दे दी गई थी। पूरी दुनिया से जुल्फिकार अली भुट्टो को माफी देने की अपील किए जाने के बावजूद तत्कालीन कार्यवाहक राष्ट्रपति जिया उल हक ने इसे ठुकरा दिया था और उन्हें फांसी दी थी।

साल भर के भीतर ही दुखद घटना से परिवार का एक बार फिर पाला पड़ा। जब फ्रांस में संदिग्ध परिस्थितियों बेनजीर के भाई शाहनवाज की हत्या कर दी गई। 1996 में बेनजीर के एक अन्य भाई मीर मुर्तजा की हत्या कर दी गई। अपने परिवार की शहादत का जिक्र करते हुए बेनजीर ने अपनी पुस्तक 'डाटर आफ द ईस्ट' में लिखा है, 'यह जिंदगी मैंने नहीं चुनी बल्कि इसने मुझे चुना है।' पाश्चात्य सभ्यता के पक्षधर पिता जुल्फिकार अली भुंट्टो और ईरानी शिया मां नुसरत भुंट्टो के घर जन्मी बेनजीर ने लिखा, 'पाकिस्तान में पैदा होने के बाद मेरी जिंदगी उठापटक, त्रासदी और जीत का आइना है। 17 अगस्त 1988 को बेनजीर ने लिए यह बदले की तरह था जब उनके पिता के हत्यारे जिया उल हक की रहस्यमयी विमान हादसे में मौत हो गई।

कट्टरपंथियों को कभी नहीं सुहाई बेनजीर

इसलामाबाद। घर में वह सबसे बड़ी बेटी थीं। बाद में पाकिस्तान की बेटी कही गई। पुरुष प्रधान सामंती समाज में पिता की राजनीतिक विरासत संभालने का दायित्व निभाया, लेकिन कभी उनके बारे में कही गई कट्टरपंथियों की बात आज सही साबित हुई और 'डाटर आफ द ईस्ट' बेनजीर भुट्टो इस दुनिया से रुखसत हो गई।

पाकिस्तान सहित किसी इसलामी देश में लोकतांत्रिक तौर पर चुनी गई सरकार में पहली महिला प्रधानमंत्री बनने का रुतबा हासिल करने वाली बेनजीर ने कभी एक साक्षात्कार में कहा था, जब मैं पहली बार चुनी गई तो उन्होंने [कट्टपंथियों ने] कहा कि एक औरत ने एक मर्द की जगह पर कब्जा कर लिया है। उसे मार देना चाहिए। उसकी हत्या कर देनी चाहिए। आधुनिक और प्रगतिवादी बेनजीर उस दौर में तो कट्टरपंथियों के निशाने पर नहीं आ सकीं, लेकिन आज वह हार गई और उन्हीं जैसे आतंकियों की गोलियों का निशाना बन गई जिन्हें अफगानिस्तान में उन्होंने पाला पोसा था। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो और बेगम नुसरत भुट्टो की सबसे बड़ी औलाद बेनजीर का जन्म 21 जून 1953 को पाकिस्तान के दूसरे सबसे बड़े शहर लाहौर में हुआ था। पाकिस्तान के शासक जनरल मुशर्रफ के साथ समझौते के बाद इस साल अक्टूबर में वतन लौटी बेनजीर का दृढ़ संकल्प और संघर्ष क्षमता उस समय दुनिया के सामने आई जब उनके पिता को 1977 में सैन्य तख्ता पलट के बाद जनरल जिया-उल-हक ने कैद कर दिया और उन पर हत्या का आरोप लगाया।

जुल्फिकार अली भुट्टो को बाद में फांसी पर लटका दिया गया। तब 26 साल की बेनजीर ने अपने पिता की राजनीतिक विरासत को संजोने की कोशिश शुरू कीं। हालांकि आक्सफोर्ड जाने से पहले मेसाच्यूएट्स के रेड क्लिफ कालेज में राजनीति विज्ञान और दर्शनशास्त्र की पढ़ाई करने के दौरान आधुनिक विचारों वाली बेनजीर जीन्स पहने वियतनाम युद्ध का विरोध करती दिखाई देती थीं। अपने संघर्ष के बल पर बेनजीर बाद में आधुनिकता और लोकतंत्र की पहचान के तौर पर स्थापित हुई और जब 1988 में पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनीं तो वह दुनिया में सबसे कम उम्र की राष्ट्राध्यक्ष थीं। उस समय उनकी उम्र महज 35 साल थी। आसिफ अली जरदारी से अपने निकाह को बेनजीर ने अपने राजनीतिक रास्ते पर चलने की कीमत के तौर पर स्वीकार किया। उन्होंने अपनी पुस्तक 'डाटर आफ द ईस्ट' में अपने राजनीतिक जीवन के लिए किए जाने वाले समझौतों का जिक्र करते हुए कहा है, अरेंज्ड मैरिज कीमत थी, जो मैंने अपने जीवन के राजनीतिक रास्ते के लिए अदा किया। जरदारी की वजह से उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। जरदारी बेनजीर के दो बार के प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान महत्वपूर्ण शख्सियत रहे, लेकिन उन पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे। उनके खिलाफ करीब 18 भ्रष्टाचार और आपराधिक मामले चले। वह आठ साल जेल में रहे और 2004 में जमानत पर रिहा हुए। बेनजीर ने अपने तीन बच्चों से जुडे़ पारिवारिक दायित्व भी बखूबी निभाए और कभी-कभी हालत यह होती थी कि बिलावल, बख्तावर या असिफा किसी न किसी को गोद में उठाए वह अपने सरकारी कामकाज निपटाती थीं। कभी स्थिति ऐसी होती थी कि बेनजीर गोद में बच्चों को उठाए सैनिकों की सलामी लिया करती थीं।

बेनजीर ने अपने पिता की मृत्यु के बाद जनरल जिया के खिलाफ संघर्ष शुरू किया और उन्हें जेल जाना पड़ा। उन्होंने पांच साल कैद में काटे। उन्होंने इसी दौरान लंदन में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का कार्यालय स्थापित किया और जिया के खिलाफ लड़ाई तेज कर दी। 1984 में वह पहली बार स्वनिर्वासित हुई और लंदन में रहने लगीं। 10 अप्रैल 1986 को वह पाकिस्तान लौटीं। उस समय स्थिति बदल चुकी थी और उनकी सभाओं में भारी भीड़ जुटती थी। 1985 में पाकिस्तान में मार्शल ला खत्म हुआ और 1988 में रहस्यमय विमान दुर्घटना में जिया उल हक की मौत के बाद वह किसी इसलामी देश में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। उनकी सरकार छह अगस्त 1990 को राष्ट्रपति गुलाम इशाक खान ने भंग कर दी। राष्ट्रपति ने उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। बेनजीर 1993 में दोबारा प्रधानमंत्री बनीं। इस बार उन्होंने अफगानिस्तान में तालिबान को समर्थन दिया। उनके इस कार्यकाल में भी सुकून नहीं आया और उनकी सरकार चली गई। 1996 में उनकी सरकार को फिर भ्रष्टाचार के आरोपों में भंग कर दिया गया। इस बार यह काम राष्ट्रपति फारूक अहमद लेधारी ने किया। कई विश्लेषकों का मानना है कि बेनजीर के पतन को उनके पति के कथित लालच ने तेज किया जिन पर 10 करोड़ डालर विदेशों में रखने का आरोप लगा। बेनजीर के दूसरे कार्यकाल के दौरान सितंबर 1996 में तालिबान ने काबुल में सत्ता संभाली। उन्हीं के शासनकाल में तालिबान ने अफगानिस्तान में महत्व प्राप्त किया। वह तालिबान को एक ऐसे समूह के रूप में देखती थीं जो अफगानिस्तान को स्थिरता दे सकता है। बेनजीर को 1999 में अदालत में उपस्थित नहीं होने का दोषी ठहराया गया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फैसले को पलट दिया। इसके बाद उसी साल बेनजीर विदेश में रहने चल गई, लेकिन उनकी और उनकी पति की संपत्ति से जुड़े सवाल उनका पीछा करते रहे। बेनजीर अपने तीन बच्चों के साथ दुबई में रहीं और 2004 में रिहा होने के बाद जरदारी भी उनके साथ रहने लगे। वह 18 अक्टूबर को पाकिस्तान लौटीं। इससे पहले मुशर्रफ ने एक कानून और अध्यादेश पर दस्तखत किए जिनसे उन्हें भ्रष्टा चार के मामलों में आम माफी मिल गई। उनकी वापसी पर निकले जुलूस पर भी आत्मघाती हमला हुआ, जिसमें करीब 140 लोग मारे गए थे और कई अन्य घायल हुए। उस बार तो वह बाल-बाल बच गई, लेकिन आज वैसा नहीं हुआ और आत्मघाती हमले में यह जहीन नेता हमेशा के लिए दुनिया से रुखसत हो गई।

मां से सूरत, पिता से सीरत

नई दिल्ली। चार भाई बहनों में सबसे बड़ी बेनजीर अपने खानदान की सबसे प्रभावशाली वारिस साबित हुई। उन्होंने अपने पिता जुल्फिकार अली भुंट्टो से राजनीति-कूटनीति और व्यवहारनीति के सबक लिए, वहीं ईरानी मूल की मां नुसरत से नजाकत और नफासत की सीख ली। पाकिस्तान में लोग कहते थे कि बेनजीर ने सूरत मां से ली और सीरत पिता से।

जुल्फिकार अली भुंट्टो की चार संतानें हुई। दो बेटियां, दो बेटे। बेनजीर, मुर्तजा, सनम और शाहनवाज। बेनजीर सबसे अलग थीं, सूरत में और सीरत में भी। यद्यपि उनके पिता जुल्फिकार को भी ऊपर वाले ने शानदार शख्सियत बख्शी थी लेकिन मां नुसरत पर तो जैसे खूबसूरती न्यौछावर थी। जब जुल्फिकार पाकिस्तान के शीर्ष पदों पर विराजमान थे, उन दिनों कभी-कभी नुसरत मीडिया में उनसे ज्यादा स्पेस हासिल कर लेती थीं, वजह थी उनकी खूबसूरती और नजाकत-नफासत भरी व्यवहार कुशलता। दरअसल नुसरत इस्फहानी मूल रूप से ईरानी कुर्द थीं। उनके पिता ईरानी कुर्दिस्तान प्रांत के एक धनीमानी कारोबारी थे। स्थानीय कारणों से वह बाद में पाकिस्तान के कराची में आ बसे। कराची में ही जुल्फिकार और नुसरत की मुलाकातें हुई, जिनकी नौबत निकाह तक आ गई। ये जुल्फिकार अली भुंट्टो की दूसरी शादी थी।

बेनजीर कई मौकों पर स्वीकारती थीं कि जिस्मानी खूबसूरती उन्हें अपनी ईरानी मां से मिली। इसलिए वह खुद को 'आर्यन' कहलाना भी पसंद करती थीं। बेनजीर ने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी [पीपीपी] के मुखिया का पद अपनी मां से ही हासिल किया था, ये बात अलग है कि बाद में पारिवारिक कारणों से नुसरत अपनी बेटी से नाराज हो गई। उन्होंने घरेलू विवाद में बड़े बेटे मुर्तजा का पक्ष लेना शुरू कर दिया। नुसरत चाहती थीं कि पीपीपी का नेतृत्व भी बेनजीर के बजाय मुर्तजा संभालें लेकिन यहीं पर बेटी की प्रतिभा और कुशलता आड़े आ गई। पार्टी का बहुमत भी बेनजीर के साथ था। बाद में मुर्तजा की हत्या के बाद नुसरत के पास बेटी का साथ लेने के अलावा कोई चारा ही नहीं रहा।




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