फ्रांस-भारत परमाणु संधि पर ईयू दुविधा में

ब्रुसेल्स [टी. ब्रजेश]। अमेरिका के साथ नाभिकीय ऊर्जा करार को लेकर जहां देश की राजनीति में बवाल मचा हुआ है, वहीं फ्रांस और भारत के बीच परमाणु संधि की संभावना से यूरोपीय संघ की सियासत में हलचल मच गई है। ईयू के महत्वपूर्ण सदस्य देश फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी के नई दिल्ली के साथ असैन्य परमाणु करार में दिलचस्पी जाहिर करने से ईयू पूरी तरह से दुविधा में फंस गया है।

यूरोप के 27 मुल्कों के संगठन ईयू के राजनैतिक प्रबंधकों की हैरानी इस बात को लेकर है कि अगर फ्रांस और भारत के बीच परमाणु ऊर्जा करार होने की नौबत आ ही जाती है तो यूरोपीय संघ उसे मंजूरी कैसे दे सकेगा। ऐसी स्थिति में सबसे बड़ा पेंच यह होगा कि ईयू अपने सदस्य देशों को ऐसे किसी भी राष्ट्र के साथ नाभिकीय ऊर्जा संधि की अनुमति नहीं देता है जिसने परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर नहीं किए हों। और भारत भी उनमें से एक है।

बु्रसेल्स स्थित ईयू कमीशन के मुख्यालय में 'दैनिक जागरण' से बातचीत में आला अधिकारी भारत के साथ परमाणु करार करने को लेकर सरकोजी के वादे पर दुविधा में नजर आए। ईयू में विदेशी मामलों की कमिश्नर बेनिटा फेरेरो वाल्डनर की प्रवक्ता ने भी इस सवाल को टालने में ही भलाई समझी। उन्होंने कहा, 'अभी फ्रांस और भारत के बीच ऐसा कोई भी समझौता उस स्थिति तक नहीं पहुंचा है जहां ईयू के प्रतिक्रिया की जरूरत हो।'

विदेशी मामलों से जुड़े विभाग के एक अधिकारी ने कहा, 'सरकोजी से सीधे तौर पर चर्चा किए बिना कोई भी अधिकृत टिप्पणी जारी नहीं की जा सकती।' हालांकि सरकोजी का नाम लिए बगैर उन्होंने पुष्टि की कि ईयू की मंजूरी ऐसे किसी भी नाभिकीय ऊर्जा करार को नहीं दी जा सकती जो एनपीटी समूह में भागीदार न हो।

नई दिल्ली में गणतंत्र दिवस पर करार के बारे में अपनी घोषणा को लेकर फ्रांस के प्रमुख कितने गंभीर थे यह तो समय ही बताएगा लेकिन ईयू में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर खलबली मची हुई है। यूरोपियन संसद के गलियारों में भी सियासत कुछ गरम नहीं हो रही है।

ईयू कमीशन के रणनीतिकारों का मानना है कि सरकोजी के प्रस्ताव ने उन तत्वों को मौका दे दिया है जो भारत के साथ ईयू के संबंधों को प्रगाढ़ करने में वांछनीय सफलता नहीं मिल पाने के लिए पहले ही फ्रांस, इंग्लैंड व जर्मनी को ही दोषी ठहराते रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, ईयू विरोधी राजनीति को गरमाने वाले इन तत्वों ने यही साबित करने की कोशिश की है कि फ्रांस, जर्मनी समेत सारे ताकतवर राष्ट्र ईयू को मजबूत करने को लेकर भाषण तो देते हैं लेकिन वे नई दिल्ली में अपने देशों के ही हित की बात करते हैं।




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