न्यूयार्क। इस बात की संभावना अब बहुत कम है कि भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु करार बुश के शासन काल में हो सकेगा। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करार को लेकर गतिरोध अभी जारी है। खासकर वामपंथियों के विरोध को देखते हुए ऐसा लगता नहीं कि इस साल के अंत तक यह समझौता हो सकेगा। बुश का कार्यकाल अगले साल जनवरी में खत्म हो रहा है।
द वाल स्ट्रीट जर्नल ने अमेरिकी प्रशासन के हवाले से कहा है कि करार को लेकर नई दिल्ली पूरी तरह प्रतिबद्ध है। भारतीय संसद को इसे जून तक मंजूरी दे देनी चाहिए। अमेरिकी कांग्रेस ने देश के कानून के मुताबिक करार की अंतिम समयसीमा जून तय की है। अखबार के अनुसार जिस तरह की खबरें भारत से आ रही है, वाशिंगटन में यह धारणा जोर पकड़ने लगी है कि बुश के शासनकाल में यह समझौता नहीं हो सकेगा। कुछ अमेरिकी अधिकारियों का तो यहां तक कहना है कि भारत भी अमेरिका की नई सरकार का इंतजार कर रहा है। एक अधिकारी ने कहा कि इसमें कुछ भी अजीब नहीं है। बुश का शासनकाल खत्म होने वाला है। ऐसे में भारत समझौते को लेकर नई सरकार से ज्यादा उम्मीदें लगाता है तो इसे गलत नहीं कहा जा सकता।
रिपोर्ट के मुताबिक कुछ भारतीय सुरक्षा विशेषज्ञ अन्य देशों के साथ बेहतर ऊर्जा समझौते के पक्ष में हैं। इसके संकेत भी मिल रहे हैं। भारत विभिन्न तेल उत्पादक देशों के लगातार संपर्क में है। पिछले महीने ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद नई दिल्ली गए थे। इस मौके पर दोनों देशों के बीच कई ऊर्जा परियोजनाओं पर समझौते हुए।