
लंदन। यदि आप से कहा जाए कि बच्चों के रोने या चीखने चिल्लाने की भी भाषा होती है तो आप इस पर विश्वास नहीं करेंगे क्योंकि एक नए अध्ययन में सुझाया गया है कि बच्चे गर्भावस्था में ही अपनी मातृ भाषा को समझने लगते हैं और अपनी इसी भाषा और अंदाज में वे रोते हैं। यह अध्ययन अमेरिकी पत्रिका जर्नल करेंट बायलाजी में प्रकाशित किया गया है।
जर्मनी के वर्जबर्ग विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के एक दल ने 60 स्वस्थ नवजात बच्चों के रुदन का विश्लेषण कर इस बात का पता लगाया कि नवजात शिशु न केवल अलग अलग तरह से रोते हैं, बल्कि उस तरह की आवाजें भी निकालते हैं जो उनके अंतिम तीन माह के गर्भकाल के जीवन के दौरान उन्होंने मुश्किल से सुनी होती होंगी।
उनका कहना है कि गर्भकाल के अंतिम समय में बच्चे अपनी मां की आवाज को सुनते हैं और अपने रोने में भी इसी तरीके की नकल करते हैं। कैथलीन वर्मके के नेतृत्व में एक दल ने अपने विश्लेषण के लिए तीन से पांच साल की आयुवर्ग के 60 नवजातों के रोने की आवाज सुनी।
इनमें से 30 नवजात फ्रेंच भाषी परिवारों में जन्मे थे और 30 जर्मन भाषी परिवारों से थे। उन्होंने इन शिशुओं की मातृभाषा के आधार पर उनके रोने के तरीकों में अंतर को स्पष्ट किया। जहां फ्रांसीसी नवजातों को ऊंची लय के साथ रोते सुना गया, वहीं जर्मन बच्चे नीची लय में रो रहे थे। वर्मके ने कहा कि ये पैटर्न दोनों भाषाओं के बीच लक्षणात्मक अंतर के संगत हैं।
उन्होंने कहा कि स्वरशैली के लिहाज से फ्रांसीसी लोग बेहद भिन्न होते हैं। अगर आप कि फ्रांसीसी वक्ता को सुनेंगे तो आपको उसके शब्दों और वाक्यों की लय थोड़ी ऊंची सुनाई देगी। उन्होंने कहा कि हम जानते हैं कि नवजात शिशु अपनी मां की आवाज को पहचानने में सक्षम होते हैं। जब वे गर्भ में होते हैं तो मां का स्वर और सुर काम करते हैं।
उन्होंने कहा कि बच्चे भाषा सीखने और उसकी नकल करने के लिए आतुर रहते हैं। अध्ययन के नाटकीय परिणाम में पाया गया कि बच्चे न सिर्फ विभिन्न तरीके से रोते हैं बल्कि उस धुन के पैटर्न को अपनाने की कोशिश करते हैं जिसकी भाषा उनके लिए बेहद कठिन होती है।