
इस्लामाबाद। भले ही पाकिस्तान सरकार तालिबान के खात्मे के दावे कर रही हो। लेकिन लोगों के दिलों में उसका खौफ बरकरार है। तालिबान यह बखूबी जानता है कि उसकी दहशत तभी रह सकती है जब उसके फरमान को लोग सिर झुकाकर मान लें।
यह तभी संभव है जब लोगों को शिक्षा से दूर रखा जाए। अपने इस मंसूबे में तालिबान पूरी तरह सफल भी है। करीब 17 करोड़ की आबादी वाले पाकिस्तान के आधे पुरुष व दो तिहाई महिलाएं निरक्षर हैं। एक बड़ा वर्ग वैचारिक रूप से तालिबान की हौसलाअफजाई कर रहा है।
पंजाब प्रांत के घारेबंद कस्बे का प्राइमरी स्कूल। कक्षा में बैठी 60 लड़कियां ब्लैकबोर्ड पर लिखे शरीर के अंगों को याद कर रही हैं। तभी अचानक उनकी शिक्षिका चली जाती है और फिर कभी लौट कर नहीं आई। यह तो सिर्फ बानगी है।
पाकिस्तान के ज्यादातर स्कूल भूतबंगला बन चुके हैं। पाकिस्तान के महज 60 फीसदी लड़के व 50 फीसदी लड़कियां ही प्राइमरी स्कूल जाते हैं। सेकेंडरी कक्षाओं की स्थिति तो और भी खराब है। 11वीं-12वीं में 23 फीसदी लड़कों व 18 फीसदी लड़कियों की उपस्थिति देखी गई।
बदतर हैं हालात
अपने पड़ोसी मुल्कों की अपेक्षा पाकिस्तान के हालात ज्यादा बदतर हैं। अफगानिस्तान में करीब 66 फीसदी बच्चे प्राइमरी स्कूल जाते हैं। भारत में करीब दो तिहाई वयस्क साक्षर हैं।
मतलब साफ है कि बिना पढ़े-लिखे लोगों को नियंत्रित करना और इस्लामी अतिवाद से भड़काना ज्यादा आसान होता है। पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद की धुरी बन चुका है और इसके पीछे लाखों लोगों को बुनियादी शिक्षा न मिल पाना जिम्मेदार है।
बदल रही है फिजा
जोतियांवाला के एक गांव में किसान रब नवाज, अपनी मां भीरान, पत्नी आमना व चार बच्चों के साथ रहते हैं। न तो भीरान स्कूल गई, न ही नवाज और न ही आमना। आज उनके बच्चे भी नहीं पढ़ना चाहते। कभी-कभार वे मदरसे जरूर चले जाते हैं वो भी धर्म की कुछ बातें जानने के लिए।
नवाज तहेदिल से चाहते हैं कि उनके बच्चे नियमित रूप से स्कूल जाएं। लेकिन उनके घर से स्कूल बहुत दूर है। समस्याएं और भी हैं। प्राइमरी स्कूल के शिक्षक को महज ढाई हजार रुपये तनख्वाह ही मिल पाती है। ऐसे में वह बहुत ज्यादा दिनों तक पढ़ा नहीं पाता।