
काठमांडू। नेपाल में बृहस्पतिवार को होने वाले संविधान सभा के चुनाव माओवादी छापामार लड़ाकों के लोकतांत्रिक राजनीति में औपचारिक प्रवेश तथा 240 वर्ष पुरानी हिंदू राजशाही के खात्मे का आगाज साबित होंगे।
हिमालय की गोद में बसे इस गरीब, कमजोर और लचर प्रशासन वाले देश में नौ वर्षों में पहली बार चुनाव हो रहे हैं। इस चुनाव से दशक भर से चली आ रही हिंसा के बाद शांति की स्थापना में मदद मिलेगी। इसके साथ ही नेपाल को आर्थिक रूप से शक्तिशाली भारत के नक्शेकदम पर चलकर समृद्धि के युग में प्रवेश करने का अवसर मिलेगा। चुनाव के बाद नेपाल में लोकतंत्र की औपचारिक रूप से बहाली हो जाएगी। नेपाली टाइम्स के संपादक कुंडा दीक्षित ने कहा कि सभी समस्याएं रातों-रात नहीं सुलझ जाएंगी, लेकिन इतिहास का एक अध्याय पूरा होकर दूसरे की शुरुआत होगी। हालांकि आगे चुनौतियां कम नहीं हैं क्योंकि हिंसा एवं डराने धमकाने से इस अभियान को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा है। इससे बृहस्पतिवार को मतदान पर असर पड़ने की संभावना है। सबसे प्रमुख चुनौती तो माओवादियों में बेलगाम उपद्रवी तत्व हैं जो अपनी जीत के लिए कल्पना से परे जाकर कोई भी कदम उठा सकते हैं। उनकी युवा इकाई के कार्यकर्ताओं पर विरोधी पार्टी के कार्यकर्ताओं की पिटाई करने और मतदाताओं को प्रभावित करने के आरोप लगे हैं। वरिष्ठ पत्रकार युवराज घिमिरे ने कहा है कि एक शांति समझौते पर दो वर्ष पहले हस्ताक्षर किए गए थे लेकिन अभी यह कोल्ड स्टोरेज में है। इसके कुछ ही प्रावधान लागू किए गए हैं। नेपाल के सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न है कि माओवादी चुनाव को कितना स्वतंत्र एवं निष्पक्ष होने देंगे। क्या वे अपनी हार को शांतिपूर्ण ढंग से स्वीकार कर पाएंगे। तमाम विदेशी खासकर पश्चिमी देशों के राजनयिक भी माओवादियों पर विश्वास नहीं करते हैं। उनके मंसूबों को शक की नजर से देखते हैं। देश के किसी भी राजनेता को माओवादियों के बहुमत हासिल करने की उम्मीद नहीं है। हालांकि उनकी हार की दशा में लोगों को उनके जंगलों में लौटने की उम्मीद है। दुनिया के दस सबसे गरीब देशों में से एक नेपाल में राजनीति को भ्रष्टाचार एवं अनैतिकता का पर्यायवाची समझा जाता है। नए नेपाल के विचार को जनसमर्थन तो मिला है लेकिन माओवादियों की कुचेष्टाओं ने इसे हाशिये पर धकेल दिया।