काठमांडू। नेपाल में बड़े पैमाने पर हुई हिंसा के बाद बृहस्पतिवार को ऐतिहासिक संविधान सभा के चुनाव के लिए वोट डाले जाएंगे। माओवादियों को उम्मीद है कि इसके बाद उन्हें मुख्यधारा के राजनीतिक दलों को सदियों पुरानी राजशाही खत्म करने के लिए राजी करने का मौका मिलेगा। साथ ही विद्रोही वाली उनकी छवि भी सुधरेगी।
नेपाल की भावी राजनीतिक प्रणाली तय करने के लिए एक करोड़ 76 लाख मतदाता मतदान कर सकेंगे। आनुपातिक मतदान प्रणाली के तहत करीब छह हजार उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं जबकि प्रत्यक्ष मतदान चुनाव प्रणाली के तहत 4021 उम्मीदवार मैदान में हैं। चुनाव में कुल मिलाकर 55 राजनीतिक दल शिरकत कर रहे हैं। सत्तारूढ़ सात दलीय गठबंधन का समान एजेंडा है-राजशाही का अंत कर एक संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र की स्थापना।
इसबीच कम्युनिस्ट पार्टी के एक उम्मीदवार की अज्ञात व्यक्तियों ने गोली मारकर हत्या कर दी जबकि वामपंथी दलों तथा नेपाली कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के बीच ताजा झड़प के बाद की गई पुलिस फायरिंग में सात माओवादी मारे गए। चुनाव प्रचार के दौरान भी बडे़ पैमाने पर हिंसा हुई। यह मतदान उस शांति प्रक्रिया के पूरा होने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा जो नवंबर 2006 में आरंभ हुई थी। इसके बाद सीपीएन-माओवादी अपना दशकों पुराना सशस्त्र संघर्ष त्याग कर राजनीतिक मुख्यधारा में शामिल हो गई थी। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर सहित सैकड़ों अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक मतदान की निगरानी के लिए नेपाल में हैं।
भारतीय मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी भी मतदान की निगरानी कर रहे हैं। चुनाव के बाद 601 सीट वाली संविधान सभा अस्तित्व में आएगी। यह संविधान को फिर से लिखेगी और शायद नरेश ज्ञानेंद्र के शासन का अंत करेगी। हिंसा की आशंका को देखते हुए चुनाव आयोग ने 21 हजार मतदान केंद्रों पर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की है। प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला सेनाध्यक्ष सहित सभी चार सुरक्षा एजेंसियों के प्रमुखों से मिले और उन्हें सुरक्षा संबंधी निर्देश दिए। भारत ने भी वहां चुनावों के मद्देनजर सीमा पर सतर्कता बढ़ा दी है। दिल्ली में गृहमंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक नेपाल से लगती करीब 750 किलोमीटर की सीमा पर हाईअलर्ट घोषित कर दिया गया है।