
काबुल [पैट्रिक काकबर्न]। आखिरकार दूसरे चरण के चुनाव [रनआफ] में हिस्सा लिए बगैर हामिद करजई दोबारा राष्ट्रपति पद पर काबिज हो गए। देश के अंदर व बाहर मौजूद करजई के सहयोगी भली-भांति जानते हैं कि पहले चरण के चुनाव में धांधली हुई थी। लेकिन विपक्षी नेता अब्दुल्ला अब्दुल्ला के चुनाव से हटते ही सब हाथ पर हाथ रखकर बैठ गए। आज भले ही करजई खुद को सबसे ताकतवर मान रहे हों, लेकिन वास्तविक स्थिति कहीं अलग है।
अमेरिका समेत पश्चिमी देशों की राय में अफगानिस्तान की सरकार कई मायनों में कमजोर साबित होगी जिससे उम्मीदें बांधना बेमानी साबित होगा। ओबामा प्रशासन का मानना है कि वह एक ऐसे मुल्क में हजारों सैनिक भेज रहा है जहां दुनिया की सबसे भ्रष्ट, धोखेबाज और कमजोर सरकार है। इन दिनों अफगानों में एक कहावत काफी चर्चा में है, 'ऐसा नहीं है कि अफगानिस्तान में तालिबान काफी मजबूत है बल्कि वहां सरकार काफी कमजोर है।' ऐसे में सरकार से बेहतरी की उम्मीद करना नाकाफी होगा। माना जा रहा है कि अमेरिका और उसके सहयोगी अफगानिस्तान की राष्ट्रीय एकता के लिए करजई व अब्दुल्ला के बीच समझौते के प्रयास कर सकते हैं ताकि राष्ट्रीय सहमति की सरकार बन सके। लेकिन जब दोनों लोगों में विचारधारा के स्तर पर अलगाव हो चुका हो तो उनमें समझौता किस तरह संभव है। अगर दबाव में समझौता हो भी गया तो तय नहीं है कि कितने दिन चलेगा।
कल का इराक, आज का अफगानिस्तान
ओबामा के पूर्ववर्ती रहे जार्ज डब्लू बुश ने इराक को अपना सबसे बड़ा दुश्मन माना था। इसके उलट ओबामा ने नीतिगत परिवर्तन करते हुए इराक के प्रति नरम व अफगानिस्तान के कठोर रवैया अख्तियार किया। अमेरिका समेत कई पश्चिमी देशों का मानना है कि आज उन्हें जितना खतरा अफगानिस्तान से है उतना कभी इराक से नहीं था।
अफगानिस्तान के उलट इराक में 2005 में लोकतांत्रिक सरकार का गठन हुआ था। वहां गृहयुद्ध की स्थिति भी इसलिए बनी कि आबादी के एक बड़े हिस्से सुन्नी अरबों ने सत्ताधारी दल को स्वीकार नहीं किया। शियाओं ने भी वहां अमेरिकी आधिपत्य को स्वीकार नहीं किया लेकिन सत्ता मिलने पर सहयोग करने की बात कही। इराक में केवल कुर्द ही अमेरिका के लंबे समय तक सहयोगी रहे। इराक व अफगानिस्तान की भौगोलिक संरचनाएं भी खासी अलग हैं। दजला-फरात नदियों के किनारे बसे इराक की ज्यादातर आबादी शहरी व कस्बाई है जहां गोरिल्ला युद्ध करना कहीं से भी संभव नहीं है। जबकि अफगानिस्तान में ऊंचे पहाड़, दूरदराज स्थित गांव व कटी-फटी पहाड़ियां आतंकियों का ठिकानों के लिए मुफीद हैं। [द इंडिपेंडेंट]