
सहरसा। जल जीवन है, परंतु कोसी के इलाके में यह अभिशाप बन गया है। इसे देवी- देवताओं का प्रकोप मानकर बैठ जाना उचित नहीं है। दरअसल हमने प्रकृति से अपने रिश्ते तो तोड़ा है। नदियां भी छेड़छाड़ करने पर अपनी प्रतिक्रिया देती है। नदियों को बांधने के कारण जनता बार-बार बाढ़ का अभिशाप झेलती है।
उक्त बातें भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय के कुलपति डा. आर पी श्रीवास्तव ने रविवार को विवाह भवन में बाढ़ मुक्ति अभियान विषय पर आयोजित सेमिनार में उद्घाटन भाषण करते हुए कही। कोसी पीड़ित संघर्ष मोर्चा के तत्वावधान में प्रो. विद्यानंद यादव की अध्यक्षता में संबोधित करते हुए कुलपति ने कहा कि जिस नदी को हम माता मानते हैं वह कुमाता बनने पर आतुर है। उसके कारणों पर मंथन करना वक्त की आवश्यकता है।
मुख्य अतिथि के रूप में जल विशेषज्ञ दिनेश मिश्र ने के एल राव के प्रस्ताव पर नेहरू जी द्वारा तटबंध के निर्माण कराये जाने से लेकर अब तक की तबाही का विस्तार से जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 1984 से हम इस समस्या को लेकर रट लगा रहे है, परंतु कोई भी सरकार इससे सुनने को तैयार नही हैं। कोसी तटबंध बनाने के समय सरकार ने दो लाख 14 हजार हेक्टेयर भूमि की रक्षा का वादा किया था, परंतु गत वर्ष की बाढ़ ने भी चार लाख 25 हजार हेक्टेयर जमीन को डूबा दिया। कोसी के इतिहास में पहली बार 527 लोगों की डूबकर मौत हो गई। श्री मिश्र ने कहा कि बाढ़ समस्या से समाधान से इतर सरकारें राहत और मुआवजे के नाम पर शाबासी बटोरना चाहती है। एक दूसरे सरकार पर दोषारोपन कर अपनी पीठ थपथपा रही है, सच्चाई यह है कि तटबंध निर्माण से अब तक के आठ बार आयी बाढ़ ने सभी सरकारों को नंगा कर दिया है। जल विशेषज्ञ ने कहा कि सरकारें अनाप-शनाप तर्क और समस्या के समाधान का मिथ्या प्रलाप करती है। उन्होंने सरकार के झूठ और फरेब के जबाव के लिए जनता को तैयार रहने की अपील की।
अनवर आजाद की अध्यक्षता में सेमिनार को संबोधित करते हुए बिहार सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष तपेश्वर भाई, पूर्व अध्यक्ष शिवानंद भाई, उपाध्यक्ष सरला बहन, पूर्व विधायक सतीश चन्द्र झा, सामाजिक कार्यकर्ता कामेश्वर भारती, महाप्रकाश, चन्द्रशेखर जी, बारा खादी ग्रामोद्योग संघ के अरविन्द झा, कहरा के पूर्व प्रमुख शंभुनाथ झा, देवकुमार सिंह, राजेन्द्र भाई, अवध नारायण यादव, राजेश भट्ट, कविन्द्र पांडेय, दीनानाथ पटेल आदि ने कोसी समस्या पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए बाढ़ समस्या के समाधान के लिए नदियों के मुक्त विचरण की वकालत की।