
मोतिहारी (पूच)। नगर भवन परिसर में कौमी एकजेहती मोर्चा के तत्वावधान में रविवार को होने वाले अखिल भारतीय मुशायरा व कवि सम्मेलन की तैयारी पूरी हो चुकी है। बस इंतजार है आज की शाम के उस हसीन पल का जब मुल्क के नामचीन शोअरा व शायरात अपनी गजलों, नजमों, रूबाइयों व मुक्तकों की बारिश करेंगे और उसमें तरबतर होंगे शामयीन। कभी गजल को जब परिभाषा में ढाला गया तो जो नज्म बनी उसे कुछ यूं पढ़ा जाता है- बन के चश्मा-ए-फिरदौस उभरती है गजल, हुक्म-ए-रिजवां होतो धरती पर उतरती है गजल। गजल की तारीख जानने की जरूरत शायद अब नहीं रही। तेरहवीं सदी में खिलजियों के शासनकाल में हिन्दी खड़ी बोली में बाबा आदम रचनाकार अमीर खुसरों ने गजल लिखी थी- गोरी सोवे सेज पर मुखपर डारे केश,चल खुसरो घर आपनो, सांझ भई चहुं देश। दुष्यंत कुमार की हिन्दी गजलें अमीर खुसरो के सात सौ साल बाद आयी-कहां तो रौशनी मुकर्रर था हरेक घर के लिए, कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए। इन सात सौ सालों में उर्दू शायरी ने जमाने के हिसाब से अपने रंग ढंग बदले। इसी दरम्यान उर्दू गजलें दरबार-ए-खास से निकल कर आम लोगों के बीच दस्तक दी। हुस्नों-जमाल, मय-मयखाने की जद से आजाद होकर इंसानी हुकूक और रोटी से उनका जुड़ाव हुआ। ई.पू. 600 तक भारतीय भाषा संस्कृत थी। बुद्ध और महावीर के समय में संस्कृत का स्थान पाली व प्राकृत भाषा ने ग्रहण किया। संस्कृत पाली व प्राकृत में भेद होते हुये भी कई समानता थी। पूर्व के कवि अश्वघोष, माघ, कालिदास और बाण की बनायी लीक से अलग बाद के कवियों ने इसी भाषा में रचनाएं की। वास्तव में अमीर खुसरो ने तत्कालीन समाज के दो हिस्सों में भाषायी समन्वय बनाने का बेमिसाल काम किया। परंतु यह धारा अविछिन्न बह नहीं पायी और उसी की उपधारा बनकर रेखता निकली जो बाद में उर्दू कहलाई। तब के बाद खड़ी बोली नागरी की दो धाराएं चल निकली, फारसी मिश्रित भाषा उर्दू हुई और संस्कृतनिष्ठ भाषा हिन्दी हो गयी। उर्दू के तत्कालीन ज्यादातर शायर विदेशी थे। इसलिए अपनी रचनाओं में उर्दू के साथ हिंदी के बदले फारसी शब्दों का इस्तेमाल किया करते थे। हालांकि बाद के दिनों में उर्दू को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा और वह एक खास सीमा रेखा में महदूद हो गयी। लेकिन जदीद शायरी के दौर में शायरों ने उस सीमा रेखा को तोड़ा और उर्दू-हिन्दी का फासला धीरे-धीरे कम होता गया।
रास्ते को भी दोष दे, आंखें भी कर लाल, चप्पल में जो कील है पहले उसे निकाल या कुछ लोग यूं ही शहर में हमसे भी खफा हैं, हर एक से अपनी भी तबियत नहीं मिलती। जैसी कालजयी रचनाओं से आधी से अधिक दुनिया में कामयाबी के झंडे गाड़ने वाले गंगा जमुनी तहजीब के जबर्दस्त पैरोकार पद्मश्री निदा फाजली समारोह के मुख्य आकर्षण है। युवा शायर शकील आजमी की रचनाएं भी युवा मन को झक झोरेगी। बहुत गरूर है उसे दरिया होने पर हमारी प्यास से उलझे तो..के रचनाकार डा.राहत इन्दौरी, राही वस्तवी, अल्ताफ जिया, इकबाल अशहर, माजिद देवबंदी की गजलें, शायरी और तंग इनायतपुरी व पोपुलर मेरठी के मजाहिया शेर श्रोताओं को गुदगुदाएंगे।