
संजीव गुप्ता, नई दिल्ली
पहली सितंबर से राजधानीवासियों को बस संकट का सामना करना पड़ सकता है। इसका कारण परमिट खत्म हो जाने से करीब पौने 500 ब्लूलाइन बसों का सड़कों से हट जाना होगा। खास बात यह कि इनका विकल्प मानी जा रही डिम्ट्स की कलस्टर योजना भी अब तक मूर्त रूप नहीं ले पाई है। ऐसे में अगर परिवहन विभाग इन बसों का परमिट फिर रिन्यू करता है तो हाईकोर्ट के आदेश का उल्लंघन होगा और अगर नहीं करता है तो विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उत्पन्न होने वाला यह बस संकट सरकार के लिए गले की फांस बन सकता है।
ज्ञात हो कि राजधानीवासियों को किलर लाइन के रूप में कुख्यात ब्लूलाइन बसों से मुक्ति दिलाने के लिए ही परिवहन विभाग और डिम्ट्स ने करीब साल भर पहले कलस्टर योजना बनाई थी। इसके तहत दिल्ली को 17 हिस्सों में बांटा गया है और हर हिस्से में अलग कंपनी की बसें चलनी हैं। लेकिन यह योजना अब तक कागजों में ही है और इसे मूर्त रूप लेने में कम से कम छह माह और लगेगा।
दूसरी तरफ ब्लूलाइन बसों को चार-चार माह के जो अस्थायी परमिट दिए गए थे, खत्म होने शुरू हो गए हैं। इसी माह 28 बसें परमिट खत्म होने से सड़कों से हट चुकी हैं तो अगस्त में 444 बसों के परमिट और खत्म हो जाएंगे। मतलब यह कि कुल 3,198 ब्लूलाइन बसों में से 31 अगस्त तक 472 बसें हट जाएंगी। विभिन्न रूटों पर लगी होने से इन बसों के हटने पर लोगों को परेशानी होना भी स्वाभाविक ही है। समस्या यह भी है कि अगर परिवहन विभाग इन बसों के परमिट रिन्यू करता है तो हाईकोर्ट नाराज हो सकती है, क्योंकि इन बसों को हटाने के लिए हाईकोर्ट कई बार सरकार को सख्त आदेश दे चुकी है। यदि परमिट रिन्यू नहीं किए जाते हैं तो यात्रियों का परेशान होना भी तय है और चुनाव से पहले लोगों की परेशानी सरकार के लिए भी 'परेशानी' खड़ी सकती है। ऐसे में परिवहन विभाग के अधिकारी इस मामले में कुछ भी बोलने से कतरा रहे हैं। इधर, दिल्ली बस एकता मंच के प्रवक्ता श्याम लाल गोला ने सरकार व परिवहन विभाग पर मनमानी करने का आरोप लगाया है। उनके मुताबिक जब तक इन बसों की दस साल की आयु पूरी नहीं हो जाती, इन्हें हटाना किसी भी तरह से न्यायसंगत नहीं है।