

मनीषा खत्री,नई दिल्ली
अगर लिव इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता दिए जाने के महाराष्ट्र सरकार के प्रस्ताव को केंद्र सरकार से मंजूरी मिल जाती है,तो बिना शादी किए साथ रहने वाले जोड़ों को पति पत्नी के बराबर का दर्जा मिल जाएगा। किंतु इस नए कानून के बनने के बाद किस तरह की कानूनी अड़चने तथा सामाजिक बदलाव होंगे इस बारे में कानूनविदें से जागरण ने बातचीत की। ज्यादातर लोगों का मानना है कि इससे गलत रिश्तों को बढ़ावा तो मिलेगा ही साथ ही वर्तमान में वैध शादी के लिए बने कानून व रीति-रिवाज को अपनाने वालों के लिए भी कई परेशानियां खड़ी हो जाएगी। वहीं हिंदू मैरिज एक्ट व मुस्लिम पर्सनल लॉ के साथ इस नए कानून के टकराव की स्थिति बनेगी। जबकि इससे ब्लैकमेलिंग के भी शुरु होने का खतरा है।
वरिष्ठ अधिवक्ता आर.के.नसीम का कहना है कि हिंदू मैरिज एक्ट व मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत की जाने वाली शादियों को तोड़ने का तरीका भी बनाया गया है। परंतु इस तरह के रिश्तों को खत्म करने का क्या तरीका होगा। यह सोचा जाना भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि इस कानून का अन्य कानूनों से टकराव हो जाएगा। जब कानून व समाज शादी के रिश्ते को मान्यता दे रहा है तो ऐसे रिश्तों को मान्यता देने का कोई अर्थ नहीं है। उन्होंने कहा कि ऐसे कानून बनने से कोई भी महिला अपने सहकर्मी या अन्य जानकार को ब्लैकमेल करना शुरू कर देगी। पहले ही दहेज प्रताड़ना व दुष्कर्म जैसे कानून का दुरूपयोग बढ़ रहा है।
अधिवक्ता डी.बी.गोस्वामी का कहना है कि सबसे पहले तो इस कानून के बनने से जहां एक महिला को हक मिलेगा वहीं दूसरी का हक बंट भी जाएगा। शादी से पहले किसी लड़की या शादी के बाद किसी महिला को अपने पति के इस रिश्ते के बारे में तो पता चलेगा नहीं, परंतु उसकी संपत्तिव अधिकार को बांटने के लिए जरूर कोई आ जाएगी। ऐसे में सामाजिक व कानूनी तौर पर शादी करने वाली महिलाओं में असुरक्षा की भावना जन्म लेगी। जिससे महिलाओं को ही नुकसान होगा किसी मर्द को नहीं। दूसरा कोई महिला किसी के साथ दो दिन घूमेगी और पत्नी होने का दावा ठोंक देगी। जिससे अदालतों में ऐसे मामलों की संख्या बढ़ जाएगी। वहीं अगर यह कानून मुस्लिमों के लिए भी है तो फिर से विवाद पैदा हो सकता है क्योंकि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार तो किसी महिला को तलाक दे दिया जाता है तो कोर्ट उसे गुजारा भत्ता देने का आदेश नहीं दे सकती है। ऐसे में इस तरह के कानून को किस तरह देखा जाएगा यह सोचने की बात है।
अधिवक्ता नवीन माटा का कहना है कि इस तरह के कानून की जरूरत ही नहीं है। इस तरह का कानून भारतीय समाज की पवित्रता को खराब करेगा। उन्होंने कहा कि इस तरह के रिश्ते में रहने वाली महिला गुजारा भत्ता तो घरेलू हिंसा कानून के तहत मांग ही सकती है। वहीं अवैध बच्चे को पिता की संपत्तिमें अधिकार मिल सकता है यह आदेश सुप्रीम कोर्ट दे ही चुका है फिर इस कानून की क्या जरूरत है। उन्होंने कहा कि विभिन्न धर्मो को देखते हुए यह कानून विवाद को तो जन्म देगा ही दूसरी तरफ महिलाएं इस कानून का दुरूपयोग करके ब्लैकमेलिंग का काम भी शुरू कर सकती है। वहीं कानूनी तौर पर शादी कर आई पत्नी का अधिकार बांटा जाने का डर हमेशा बना रहेगा।
समाप्त:मनीषा
10 अक्टूबर 08