
सुनील पांडेय, नई दिल्ली
इलाहाबाद के कर्नलगंज निवासी रमेश कुमार एवं कुंडा प्रतापगढ़ के पंकज सिंह घर से चले तो थे नौकरी पाने की आस में, लेकिन उनकी उम्मीदें 'कोहरे' की भेंट चढ़ गई। दोनों को अलग-अलग बहुराष्ट्रीय कंपनियों में सोमवार को इंटरव्यू देना था। इसके लिए एक को गुड़गांव, तो दूसरे को दिल्ली जाना था। लेकिन, दोनों इंटरव्यू के लिए तय समय दोपहर 12 बजे नहीं पहुंच सके। कोहरे के कारण बीच रास्ते में फंसी रेल ने उन्हें मंजिल तक पहुंचने ही नहीं दिया। एशिया की जिस सबसे बड़ी 'प्रयाग राज एक्सप्रेस' ट्रेन से दोनों इंटरव्यू देने घर से निकले थे, वह इलाहाबाद से चलकर सुबह 7 बजे नई दिल्ली पहुंचने के बदले सोमवार की शाम 4 बजे यहां पहुंची। स्वाभाविक रूप से दोनों इंटरव्यू देने से चूक गए और एक संभावित नौकरी पाने से भी वंचित रह गए। रमेश और पंकज ही नहीं, उनकी तरह अन्य यात्री भी बेवजह दिनभर ट्रेन में फंसे रहे।
वैसे, रमेश और पंकज की तरह न जाने कितने लोग कोहरे के कहर से परेशान दिखे। किसी को कारोबार में डील फाइनल करनी थी तो किसी को ड्यूटी पर जाना था। कोहरे ने रेल यातायात की धज्जियां उड़ा दी है। सुबह दिल्ली पहुंचने वाली महाबोधि एवं शिवगंगा का भी यही हाल रहा। तीन दिन से ट्रेनों की जो रफ्तार है, उससे हजारों मुसाफिरों को परेशानियां झेलनी पड़ी हैं। उत्तार प्रदेश, बिहार और झारखंड की प्रमुख ट्रेनें रद्द होने से यात्रियों के लिए घर जाना भी मुहाल हो गया है। दो-दो दिन से नई दिल्ली एवं पुरानी दिल्ली स्टेशन पर फंसे यात्री प्लेटफार्मो पर समय काटने को मजबूर हैं। स्टेशन पर प्रथम, द्वितीय श्रेणी के विश्रामालय जरूर हैं, लेकिन वहां आम यात्री घुस भी नहीं पाता। इस हालात में यात्रियों को जहां जगह मिली, वहीं बोरिया-बिस्तर बिछा पड़ गए। कई दिनों से राजेंद्र नगर जाने वाली संपूर्ण क्रांति एक्सप्रेस पकड़ने के लिए नई दिल्ली में फंसे बिहार के केशव, दिनेश, छोटकी, सुरेश, दीनानाथ एवं पारसनाथ सोमवार को बड़ी मुश्किल से ट्रेन में घुस पाए, वह भी जानवरों की तरह। प्लेटफार्म नंबर-16 पर शाम 5 बजे जैसे ही ट्रेन पहुंची, लोग टूट पड़े। हालात यह थी कि इंसान पर इंसान चढ़ रहा था। डिब्बे में जगह पाने के लिए बोरी की तरह लोग फेंके जा रहे थे। किसका हाथ दब रहा है, किसका बच्चा बिछुड़ रहा है, किसी को परवाह नहीं। हर कोई डिब्बे में घुसना चाहता था। यही कारण था कि 90 सीट की जनरल बोगी में दो सौ यात्री ठुंस गए। उन्हें हर हाल में घर जाना था, लिहाजा उन्होंने टॉयलेट में ही जगह बना ली।
रेल प्रबंधन कोहरे से बचने के लिए ट्रेनें तो कैंसिल कर रहा है, लेकिन स्टेशनों पर फंसे सैकड़ों मुसाफिर कहां जाएंगे, इसकी व्यवस्था नहीं की गई है। शायद रेलवे ने यात्रियों के लिए कभी ऐसा सोचा भी नहीं होगा। तभी तो उत्तार रेलवे के प्रवक्ता कहते हैं कि हजारों यात्रियों को ठहराना संभव ही नहीं है। ट्रेन रद्द होने से परेशान यात्रियों का दर्द रेलवे महसूस जरूर करता है, लेकिन उसके पास 'मरहम' लगाने का कोई उपाय नहीं है। कोहरे से हारी रेलवे इसे आपदा मानकर चलकर रही है।