
दुमका। बाल अधिकारों की जानकारी के अभाव में बच्चों का बदस्तूर शोषण जारी है। गरीब बच्चे, कार्यकारी बच्चे, स्ट्रीट के बच्चे और सीमांत बच्चे की श्रेणियां बांट कर इन बच्चों का शोषण हो रहा है। बूट-पालिश से लेकर होटल, कल-कारखाने, बस स्टैड, घरेलू दाई व नौकर समेत असीमित क्षेत्र व दायरे में बच्चों के भविष्य चौपट हो रहे है। इन मासूमों का शोषक वर्ग भी कोई दूसरा नहीं बल्कि समाज के प्रतिष्ठित चेहरे व कानून के रखवाले ही है। कानूनविद् राजेन्द्र बसईवाला कहते है बाल शोषण के अधिकांश मामलों के मूल में बाल अधिकारों की जानकारी का अभाव है। सही मायने में देखा जाये तो बाल अधिकारो के हनन करने की आजादी पर अंकुश नहीं लग सका है। श्री बसईवाला ने कहा कि बाल अधिकार समझौता राष्ट्रीय नहीं अंतर्राष्ट्रीय मसला है। उन्होंने कहा कि सीआरसी अथवा यूएनसीआरसी के नाम से संबोधित संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अधिसमय एक ऐसा समझौता है जिसमें नागरिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों की व्यवस्था की गयी है। इस अधिसमय से की पुष्टि जिन देशों ने की है वे अंतर्राष्ट्रीय कानून के जरिये इससे बंधे हुये है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इस समझौता को बाल अधिकारों की 30 वीं वर्षगांठ के मौके पर अपना कर 20 नवंबर 1989 सदस्य देशों के लिये जारी किया था। बाद में 193 राष्ट्रों द्वारा इसकी पुष्टि किये जाने के बाद दो सितंबर 1990 से यह प्रभावी है। भारत में 11 दिसंबर 1992 को इसकी पुष्टि की गयी जबकि वर्ष 1974 में भारत ने राष्ट्रीय बाल नीति को अंगीकार किया था। देश में बाल अधिकारों की रक्षा के लिये इन्हें शिक्षा, अभिव्यक्ति, सूचना, पौष्टिक आहार, स्वास्थ्य और देखभाल, दुर्व्यवहार से संरक्षण, शोषण से संरक्षण, उपेक्षा से संरक्षण, विकास, मनोरंजन, नाम व राष्ट्रीयता, उतरजीविता का अधिकार दिया गया है। श्री बसईवाला ने कहा कि देश में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग का गठन भी किया गया है। 29 दिसंबर 06 को संसद के अधिनियम के तहत अधिसूचित यह आयोग एक वैधानिक निकाय है। अध्यक्ष के अतिरिक्त इसमें बाल स्वास्थ्य, शिक्षा, बाल विकास और देखभाल, बाल न्याय, विकलांग बच्चे, बाल श्रम उन्मूलन, बाल मनोविज्ञान या समाज शास्त्र और बच्चों के कानून के क्षेत्रों से जुड़े छह सदस्यों का रखे जाने का प्रावधान है। इस आयोग को शिकायतों की जांच कर प्रभावी सुझाव देने का अधिकार है। आयोग का उद्देश्य बाल अधिकारों का समुचित प्रवर्तन और बच्चों से संबंधित कानून व कार्यक्रमों को प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना है। बाल अधिकारों से वंचित रखे जाने संबंधी मामलों पर स्वत: संज्ञान लेना और शिकायतों की जांच करने व इससे जुड़े तमाम मसलों पर संज्ञान लेकर कार्रवाई करने का अधिकार भी इस आयोग में निहित है। इतना ही नहीं आयोग अपने सुझावों को राज्य सरकार को भेज इसमें सुधार करने का भी निर्देश देने के लिये स्वतंत्र है। श्री बसईवाला ने कहा कि बावजूद इसके जानकारी के अभाव में प्रत्येक दिन हर मोर्चे पर बच्चों का शोषण हो रहा है जो दुखद स्थिति है।