
नोएडा, संवाददाता : 'सुभाष..मैं अपनी जिंदगी खत्म करने जा रही हूं, इसलिए नहीं कि मेरा तुम्हारे प्रति प्यार कम हो गया है। लेकिन मुझे यह आभास हो गया है कि हमारे जैसे लोगों के लिए जीवन एक जंग है और मैं इससे लड़ते-लड़ते अब पूरी तरह से टूट चुकी हूं। अगर इसके लिए कोई जिम्मेवार है तो वह हमारा समाज व इसमें रहने वाले लोग हैं'
जीवन लीला समाप्त करने से पहले लिखा डॉ. श्वेता शबनम का यह सुसाइड नोट सामाजिक बंधनों में उलझे उन हजारों लोगों की कहानी बयां करता है, जो मानसिक रूप से परेशान होकर खुदकुशी को अंतिम रास्ता मान रहे हैं।
सुसाइड नोट के अनुसार डॉ. श्वेता अपने पति से बेहद प्यार करती हैं और उसकी आंखों में उदासी नहीं देख सकती हैं। उसने लिखा है 'मुझे पता है कि मेरे इस कदम से मेरे पति की जिंदगी तबाह हो जाएगी। मेरे बाद वो जी भी पाएगा, मुझे नहीं पता। लेकिन मुझे ऐसा करना है। मेरी मरने की इच्छा जताने के बाद उनकी आंखों में आने वाली उदासी को मैं नहीं देख सकती। मुझे मरना है। मैं और नहीं लड़ सकती। मैं उनसे बहुत प्यार करती हूं। उनकी आंखों में गम नहीं देख सकती। मेरे इस कदम से उन्हें बहुत तकलीफ होगी, लेकिन ऐसा कम से कम अब एक ही बार होगा'
अपनी वरिष्ठ सहयोगी डॉ. रीता से भी उसने सुसाइड नोट में माफी मांगी है। उसने कहा कि मैं डॉक्टर के रूप में और नहीं जी सकती। मैं पागल हो चुकी हूं। लिहाजा पागलों को स्वस्थ लोगों से दूर चले जाना चाहिए। आप सब लोग मेरी वजह से परेशान होते हैं तो मुझे और भी तकलीफ होती है।
इस नोट में उसने यहां तक लिखा है कि अगर मैंने लिखना बंद नहीं किया, तो शायद मेरा मरने का इरादा टल सकता है, लेकिन मेरे लिए अब सबसे जरूरी काम यही है। उसने उन सभी लोगों से माफी मांगी है, जिनको उसके इस कदम से तकलीफ होगी।
अपने मां-बाप से नाराज डॉ. श्वेता लिखती हैं कि उसके इस कदम के बारे में शायद ही उसके परिजन को पता चले। मैं उन्हें बताना चाहती थी कि उनकी मर्जी के बगैर भी शादी कर मैं सफल जीवन जी सकती हूं, लेकिन मुझे नहीं पता था कि उन्होंने बचपन से ही मुझे बेहद कमजोर कर दिया। जमाने से लड़ते-लड़ते मेरी सारी ताकत खत्म हो चुकी है। उनके चलते मैं मानसिक रूप से बीमार हो चुकी हूं। लिहाजा मेरे इस कदम के लिए मेरे मां-बाप व खुद मैं दोषी हूं।