
इलाहाबाद । एक समय था जब रागों की कशिश और तपिश से दीये जल उठते थे और बारिश होने लगती थी। ऐसा संगीत साधकों का मानना भी है। मध्यकाल में संगीत सम्राट तानसेन ने इसे सच भी साबित किया। धीरे-धीरे राग दीपक की थाप धीमी पड़ने लगी और राग मल्हार की गमक फीकी। न तो दीये जले और न ही बादलों ने बारिश की। ध्रुपद-धमाल का कमाल धीरे धीरे गायब होता गया। लेकिन दरभंगा घराना आज भी ध्रुपद-धमाल के जरिए राग दीपक की लौ को परवान चढ़ाने में जुटा है। हालांकि धु्रपद में राग दीपक और राग मल्हार दुर्लभ हो चुके हैं। बावजूद इसके इस घराने के ही प्रेम कुमार मलिक इन दिनों नगर में दीपक भले ही न जला सके लेकिन उसके जलने का आभास जरूर करा रहे हैं।
इन दिनों संगीत प्रेमियों के लिए एक गंभीर चिंता बनी है। ध्रुपद-धमार की गायकी एकांगी हो चली और इसके गायकों की संख्या में भी कमी आयी है। गायकी की अभाव में संगीत का यह विधा भी बुझने की कगार पर है। यही हाल रहा तो राग दीपक और मल्हार मात्र धरोहर ही बन कर रह जाएंगे। यहां तक कि नए शागिर्द नहीं बन रहे हैं। फिर भी दरभंगा घराने का प्रयास जारी है। शागिर्दो की कमी को देखते हुए नगर के मलिक परिवार ने अपने पूरे परिवार को ध्रुपद-धमार की तालीम दी है।
गौरतलब है कि 17 वीं शताब्दी के दरभंगा घराना का मलिक परिवार नगर को वह रोशनी देने में जुटा है जहां पं. राधाकृष्ण व पं. कर्ताराम, पं. धर्मलाल मलिक, पं. क्षितिपाल मलिक, पं. राजितराम मलिक, पं. रामचतुर मलिक, पं. विदुर मलिक जैसे साधक हुए। जिन्होंने सुर साधना के जरिए ध्रुपद और धमार को विशेष रूप से सजाया और संवारा। दरभंगा में जीवित हैं चारो पट : प्रेम कुमार मलिक
दरभंगा घराने के संगीत मर्मज्ञ पं. प्रेम कुमार मलिक का मानना है कि ध्रुपद-धमार ही एकमात्र ऐसी विधा है जिसमें शास्त्रीय गायन का चारो पट समाहित है। आलाप प्रधान और बंदिशों में लयकारी का विशेष प्रयोग इसकी विशेषता रही है। इस विशेषता को दरभंगा घराने ने गुरु शिष्य परंपरा के तहत जिंदा रखा है। इसमें शब्द के साथ साहित्य का विशेष ख्याल रखा जाता है। हरिदास की रचना-माई री सहज जोरी प्रकट भई..हो या फिर तानसेन की-तेरो ही ज्ञान ध्यान तेरो ही सुमिरन तेरो ही जप तप तेरी ही नाम..। इनमें सार्थक शब्दों की अपनी अहमियत है। परंपरा से चले आए सार्थक रागों के जरिए ही दरभंगा घराना ने चार पट की गायकी को सुरक्षित रखा है।
श्री मलिक स्वीकार करते हैं कि आजकल इस विधा के प्रति लोगों का रुझान कम है। युवाओं में वह रियाज की कमी है जो इस विशेष विधा-राग के प्रति होनी चाहिए।