
नई दिल्ली। नकली दवा बनाने और इसकी बिक्री करने के धंधे में शामिल लोगों को आजीवन कारावास तथा अधिकतम 10 लाख रुपये के जुर्माने की सजा का सामना करना पड़ सकता है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय नकली दवाओं के कारोबारियों को इस तरह की सख्त सजा दिलाने की तैयारी में जुटा हुआ है।
मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा कि इस तैयारी को औषधि एवं प्रसाधन अधिनियम 1940 में संशोधन कर अंतिम रूप दिया जा चुका है और इसे मंजूरी के लिए शीघ्र ही कानून मंत्रालय के पास भेजा जाएगा। इसके बाद इसे मानसून सत्र में संसद में पेश किया जाएगा।
वर्तमान में नकली दवा की वजह से किसी व्यक्ति की मौत हो जाने के मामले में दोषियों को अधिकतम 10 साल की कैद और 10 हजार रुपये के जुर्माने का प्रावधान है। इस तरह के अपराध में न्यूनतम सजा की अवधि वर्तमान तीन से बढ़ाकर पांच साल कर दी गई है और इसे गैर जमानती अपराध बना दिया गया है। अधिनियम में संशोधन संबंधी कदम 2003 में भी उठाए गए थे और इसे संसद की स्थायी समिति के पास भेजा गया था। समिति ने इसे सिफारिशों के साथ स्वास्थ्य मंत्रालय को वापस कर दिया था।
वरिष्ठ अधिकारियों ने बृहस्पतिवार शाम केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामदास के सामने इससे संबंधित प्रस्ताव रखे। संशोधनों को बाजार में नकली दवाओं की भरमार की खबरों के बीच अंतिम रूप दिया गया है। देश में नकली दवाओं की वास्तविक स्थिति का पता लगाने के लिए सरकार ने खुद अध्ययन करने का फैसला किया है।
यह अध्ययन तीन सप्ताह के भीतर शुरू हो जाएगा और इसे पूरा होने में छह महीने का वक्त लगेगा। मंत्रालय ने अध्ययन के लिए 50 लाख रुपये का बजट रखा है। इस उद्देश्य के लिए देशभर से लगभग 31 हजार नमूने उठाए जाएंगे।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के हालिया अध्ययन के अनुसार दवाओं के 10 हजार नमूनों में से 3.1 प्रतिशत पर नकली होने का संदेह है, जबकि 0.3 प्रतिशत मामलों में दवाओं के नकली होने की पुष्टि हुई। एसोचैम के अनुसार दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में नकली दवाओं की बिक्री 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ गई है।
नकली दवाओं से बढ़ रहे खतरे के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करने वाली मशेलकर समिति ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट में दोषियों को कड़ी सजा दिए जाने की सिफारिश की है। समिति ने अपने अध्ययन में पाया कि नकली दवाओं से संबंधित मामले वर्षो से लंबित पड़े हैं। उसने ऐसे मामलों में त्वरित मुकदमे के लिए अलग से प्रावधान किए जाने की सिफारिश की।
भारतीय दवा उद्योग का सालाना 20 हजार करोड़ रुपये का घरेलू और 10 हजार करोड़ रुपये का निर्यात कारोबार है। पिछले दशक से यह 10 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है और मात्रा के हिसाब से देखें तो यह विश्व में चौथे स्थान पर है।