देहरादून, [अमित थपलियाल]। चंबल के सामाजिक-आर्थिक ढांचे का अध्ययन करने गए डीएवी कालेज देहरादून के छात्र-छात्राओं के सामने 60 मिनट तक जो कुछ घटा वह उसे आज तक नहीं भुला पा रहे हैं। इन 60 मिनटों के दौरान दस्युओं की दुनिया जो उन्होंने देख ली। बात यूं तो 28 दिसंबर की है पर छात्रों का दल सोमवार को ही वापस लौटा है।
गोलियों की बौछार 23 छात्र-छात्राओं के कानों में आज भी बराबर गूंज रही है। यह दल 28 दिसंबर को ग्वालियर के बीलपुरा आंचल के जंगलों की पारिस्थितिकी का अध्ययन करने पहुंचा था। दोपहर को वे जंगल के ऐसे क्षेत्र में पहुंचे जो डाकुओं का इलाका था। इसी दौरान उनकी सुरक्षा में चल रहे फारेस्ट गार्डो ने अचानक फायरिंग शुरू कर दी।
छात्र-छात्राओं का दल कुछ समझ पाता कि वहां मौजूद डाकू अपना सामान, औजार आदि छोड़ भागने लगे। वहां पर सैंडस्टोन के करीब तीन ट्रक पत्थर निकाल कर रखे हुए थे। दल के सदस्य जसपाल राणा, संतोष बमफाल व राहुल चौधरी ने बताया कि उन्होंने जोश में डाकुओं के हथियारों से उन पत्थरों को तोड़ना शुरू कर दिया। पत्थर तोड़ने की आवाज सुन अचानक हथियार बंद डाकुओं ने टीलों पर चढ़कर दल को घेर लिया और गाली गलौच करने लगे। डाकुओं को देख छात्राएं रोने लगी। कविता रावत, गौरी घिल्डियाल, सौम्या वर्मा आदि ने बताया कि डाकुओं को देख उनकी तो सांसें अटक गई थीं।
डीएवी में भूगोल विभागाध्यक्ष डा. पीएस नेगी ने बताया कि हथियारों से लैस डाकुओं ने जब घेर लिया तो हम वहां से भागने लगे। डाकुओं ने पीछा किया। इसी बीच रास्ते में डाकू आमने-सामने आ गए। डाकुओं से बातचीत कर समझाने पर वे मान गए और वहां से चले गए।
उन्होंने बताया कि जान बचने पर सभी ने भगवान का शुक्रिया किया। डा. नेगी ने बताया कि अध्ययन के दौरान यह बात सामने आई की शिक्षा के अभाव, जागरूकता की कमी और रोजगार के अवसर न होने के चलते और समाज में न्याय न मिलने पर लोगों ने डकैती का रास्ता अपनाया।
उनका कहना है कि आय के अन्य स्रोत न होने की वजह से गैरकानूनी तरीके से रेत और पत्थर के अवैध व्यापार को ही यह लोग अपनी आय का आधार बनाए हुए हैं। खैर यह दल अब वापस सुरक्षित लौट आया है तो अपने अध्ययन में कई ऐसी बातों को भी समेट कर लाया है जो 60 मिनटों के दौरान घटी।